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गंगा का अस्तित्व समाप्ति की ओर
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By विनय वीर
प्रकाशित 05/23/2008
 

सतयुग में राजा भागीरथ की तपस्या से भगवान शंकर की जटाओं से अवतरित होकर धरती पर आई गंगा आज अपनी पवित्रता को खोती जा रही है। आचमन के लायक भी इसका पानी नहीं बचा। खेती कि सिंचाई के योग्य बी अब पानी नहीं रहा।


गंगा का अस्तित्व समाप्ति की ओर
सतयुग में राजा भागीरथ की तपस्या से भगवान शंकर की जटाओं से अवतरित होकर धरती पर आई गंगा आज अपनी पवित्रता को खोती जा रही है। आचमन के लायक भी इसका पानी नहीं बचा। खेती कि सिंचाई के योग्य बी अब पानी नहीं रहा। इसका कारण ऑक्सीजन की कमी एवं लोकल कोलिफार्म की मात्रा का अधिक होना है, जो बताया है कि गंगा में नुकसानदायक जीवाणुओं की मात्रा अधिक है। इलाहाबाद और वाराणसी जो धार्मिक और पवित्र शहर माने जाते हैं, वहाँ गंगा मानव और जानवरों के सड़े-गले शवों को ढो रही है तथा शहर का सीवर लाईन का (मल-मूत्र, गंदा जल) अपने पानी में समा रही है। लगता है अब गंगा समाप्ति की ओर अग्रसर है।
त्र+ग्वेद में कहा गया है कि हमारे त्र+षि सबसे पहले गंगा को नमन कर उसका आचमन करते थे। गंगा भागीरथ की तपस्या का प्रतिफल है। आज के कलयुग में सतयुग की अवतरित गंगा अपने अस्तित्व को बचाने में असफल रही है। वह अब मरणासन्न स्थित में आ गई है। जिस गंगा का पा वेदों-पुराणों में होता रहा, अब भविष्य में वह जब लोप हो जावेगी तब उसकी कहानी हमें देखने-सुनने को भी शायद ही मिले।
जिस गंगा की दो बूंद पीने से मृत्यु पूर्व व्यक्ति की शांति प्राप्त होती थी। गंगा में स्नान करके सनातनधर्मी अपने को धन्य मानता था। जिस गंगा में डुबकी लगाने के लिये हिन्दू समाज और उसके त्र+षि मुनि लालायित रहते थे, उन्हें उससे मन की शांति तथा पवित्रता का भास होता था। वहाँ अब इसमें स्नान करने से लोग कतराते हैं। लोगों को रोगों के लगने का भय सा बना हुआ है। क्योंकि इस गंगा में अब ऑक्सीजन की मात्रा समाप्त सी हो गई है।
अन्य शहरों की हम बात नहीं करते। भारत के पवित्र एवं धार्मिक नगरों इलाहाबाद और वाराणसी में ही अगर इस गंगा की दयनीय दशा को देखेंगे तो हमारी इसके प्रति विरक्ति हो जावेगी। स्वयं लेखक ने इलाहाबाद और बनारस में सड़े-गले एवं अधजले मानव शवों एवं पशुओं की लाशों को गंगा में बहते देखा है। इन शहरों का सीवर लाईन का मल-जल एवं गन्दा पानी इसमें डाला जा रहा है। जिसे प्रशासन, नगर पालिक निगम तथा गंगा प्रदूषण बोर्ड तक नहीं रोक पाते है। गंगा की स्वच्छता एवं सफाई के लिये 1985-86 में राजीव गांधी ने 1500 करकोड़ की योनजा स्वीकृत की थी। इस योजना को तीन चरणों में सम्पन्न किया जाना था, किन्तु इसका पहला चरण ही अनपे लक्ष्य तक नहीं पहुँच सका। द्वितीय एवं तृतीय चरण का कोई अता-पता नहीं।
विगत दिनों, डॉ. मनमोहन सिंह ने वाराणसी का दौरा किया। यहाँ के घाटों का अवलोकन किया तब प्रशासन गंगा की स्वच्छता की ओर सजग हुआ। किन्तु वह भी अच्छा मजाक था। घाटों की गंदगी वर्षों से साफ नहीं हुई थी। उसकी सफाई की गई। उसे पानी की तेज़ धार से धोया गया किन्तु उन घाटों की सफाई के दौरान पूरी गंदगी गंगा में ही प्रवाहित की गई। गंगा की स्वच्छता के नाम पर उसमें गंदगी स्वयं नगर पालिक निगम एवं प्रशासन के अधिकारियोंन खड़े होकर डलवायी। इस घटना पर वाराणसी के सजग पर्यावरणविद एवं गंगा स्वच्छता के लिये समर्पित संकट मोचन फाउंडेशन के अध्यक्ष प्रो. वीरभद्र मिश्र ने कहा कि यहाँ गंगा की सफाई के नाम पर उसका माखौल उड़ाया गया है, जिसका हम विरोध करते हैं।
वैज्ञानिक आंकड़ों के अनुसार अगर देखें तो मात्र वाराणसी अकेले में ही 40 करोड़ लीटर सीवर का गंदा (मल-जल) पानी गंगा में प्रतिदिन डाला जाता है। प्रो. वीरभद्र मिश्र द्वारा स्थापित गंगा अनुसंधान प्रयोगशाला के अनुसार इसका पानी पीने योग्य होने के लिए इसमें आदर्श रूप में तो फीकल कोलिफार्म बिलकुल नहीं होना चाहिए। लेकिन सरकार की ओर से निर्धारित स्तर के अ़नुरूप भी यह प्रति लीटर 5 हज़ार से अधिक कतई नहीं होने चाहिए। नहाने योग्य पानी में 50 हज़ार से कम, केती योग्य पानी में 5 लाख से कम होना चाहिए।
लेकिन वाराणसी में इस समय गंगा नदी के विभिन्न घाटों में फीकल कोलिफार्म की संख्या 4 लाख 90 हज़ार से लेकर 21 लाख तक है। फीकल कोलिफार्म की संख्या अधिक होना यह दर्शाता है कि पानी में नुकसानदायक सूक्ष्म जीवाणु बड़ी मात्रा में मौजूद है। इसका परिणाम यह है कि अब गंगा अपने पतित पावनी स्वरूप को छोड़ कर रोगों को देने वाली हो गई है। रैज्ञानिकों का तो यहाँ तक कहना है कि नहाने की बात छोड़िए, गंगा का पानी अब सिंचाई के लायक भी नहीं रहा, पीने की बात तो दूर की रही है।
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान में गंगा अनुसंदान प्रयोगशाला के प्रोफेसर उदयकांत चौधरी के अ़नुसार वाराणसी में गंगा जल में ऑक्सीजन की भी भारी कमी देखी गई है। जहाँ शुद्ध पेयजल में ऑक्सीजन की मात्रा कम से कम 8 कण प्रति 10 लाख कण (पीपीएम) होनी चाहिए। वह घट कर महज साढ़े 3 से 4 पी.पी.एम. तक रह गई है। शासन भले ही इस बात को नकारे वह इसके लिये घाटों की जगह अन्य जगह से परीक्षण कर खानापूर्ति करें, पर यह गलत है। केन्द्र सरकार ने एक मामले में सुप्रीम कोर्ट में स्वीकार किया कि गंगा का पानी जैसा 1985 में था, वैसा ह है। उसमें कतई परिवर्तन नहीं हुआ। यानि गंगा गंदी की गंदी ही है। गंगा की शुद्धि का 15 सौ करोड़ रुपया पानी में बह गया या कहें अधिकारियों और ठेकेदारों की जेबों में चला गया।
जितना कुछ स्वच्छता का काम हुआ है वह भी पुन अपने पहले स्वरूप में आ गया है। वाराणसी के बाद हुगली में गंगा गंदगी का महारूप लेकर समुद्र में विलीन हो जाती है, अगर शासन देश के नागरिकों एवं संगठनों में जागृति आ जाती है तो गंगा पूर्व की भांति पवित्र हो सकती है। उसका स्वरूप बदला जा सकता है।