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बच्चों की आँख में भी हो सकता है कैंसर
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By विनय वीर
प्रकाशित 06/7/2008
 
Eye Cancer साढ़े तीन वर्ष की निधि की दाहिनी आँख उभर कर बाहर को आ गई, तीन वर्षीय उधो साधू चलते हुए चीजों से टकरा जाता था तथा दो वर्षीय विघ्नेश की दाई आँख में सफेद चमक सी दिखाई पड़ती थी। ये सभी बच्चे आँख के कैंसर `रेटीनोब्लास्टोमा' से पीड़ित थे।

बच्चों की आँख में भी हो सकता है कैंसर
Eye Cancer

साढ़े तीन वर्ष की निधि की दाहिनी आँख उभर कर बाहर को आ गई, तीन वर्षीय उधो साधू चलते हुए चीजों से टकरा जाता था तथा दो वर्षीय विघ्नेश की दाई आँख में सफेद चमक सी दिखाई पड़ती थी। ये सभी बच्चे आँख के कैंसर `रेटीनोब्लास्टोमा' से पीड़ित थे। आँख का यह कैंसर सिर्फ बच्चों में ही होता है और अन्य आँख के कैंसरों के मुकाबले सबसे अधिक होता है।

भारत में प्रति वर्ष 1000 बच्चे जन्म से ही इस कैंसर से पीड़ित होते हैं। भारत में ही नहीं, पाकिस्तान और मैक्सिको जैसे विकासशील देशों में भी `रेटिनोब्लास्टोमा' के मामले दिखाई पड़ते हैं। इतना ही नहीं, संयुक्त राष्ट्र अमेरिका जैसे विकसित देश में भी तकरीबन प्रति वर्ष 325 बच्चे इस कैंसर की चपेट में आ जाते हैं। अमेरिकन कैंसर सोसायटी के अनुसार, आँख के कैंसर से पीड़ित तकरीबन 40 प्रतिशत बच्चों में यह रोग अनुवांशिक तौर पर होता है, लेकिन यह भी जरूरी नहीं कि यह समस्या अनुवांशिक ही हो।

लक्षण

15 हजार नवजात शिशुओं में से किसी एक की आँख में यह कैंसर होता है और तीन साल से कम उम्र में ही इसके लक्षण दिखाई पड़ने लगते हैं। इस उम्र में रेटिना पूरी तरह विकसित नहीं होता, अत ट्यूमर तेजी से पनपने लगता है। सबसे पहले बच्चे की आँख में सफेद चमक-सी दिखाई पड़ती है, जो अंधेरे में बिल्ली की आँख की तरह चमकती है। यह `रेटिनोब्लास्टोमा' का प्रथम लक्षण है। अत ऐसे में बच्चे को तुंत नेत्र-चिकित्सक के पास ले जाना चाहिए, क्यूंकि यह कैंसर इतनी तेजी से पनपता है कि कभी-कभी कुछ ही दिनों में आँख अचानक ही उभर कर बच्चे के चेहरे को दबाने लगती है। बच्चा जन्म से ही इस कैंसर से ग्रस्त हो सकता है या फिर सात वर्ष से कम उम्र में ट्यूमर पनप सकता है।

निदान

ऐसे में बच्चे को जितनी जल्दी हो सके, नेत्र-चिकित्सक के पास ले जाकर आँखों की सही जांच पड़ताल और परीक्षण, सी टी, अल्ट्रासाउँड और एमआरआई करवाने चाहिए। याद रखिये, `रेटिनोब्लास्टोमा' के मामले में जितनी जल्दी चिकित्सक के पास जाएँगे और उपचार शुरू होगा, उतनी ही अधिक बच्चे की नेत्र ज्योति और उसकी ज़िंदगी बचने की संभावना में वृद्धि होती है।

ऐसे में अंधविश्वासों में पड़कर बच्चे की आँख और उसकी जिंदगी से खिलवाड़ नहीं करना चाहिए। क्योंकि हमारे देश में माना जाता है कि बच्चे की आँख में सफेद चमक किसी विकार या रोग का लक्षण ना होकर सौंदर्य की निशानी है। अकसर, ट्यूमर आँख में उभरकर फूल जैसा दिखने लगता है। जिसे अच्छा शगुन माना जाता है कि बच्चे में ईश्वरीय प्रदत्त शक्तियां हैं। ऐसे में अभिभावक समय गंवाते रहते हैं और जब नेत्र-चिकित्सक के पास पहुँचते हैं तो बहुत देर हो चुकी होती है। `रेटिनोब्लास्टोमा' का उपचार संभव है, अगर समय रहते और जितनी जल्दी हो सके इसका उपचार शुरू हो जाये।

उपचार

कैंसर के उपचार में किमोथैरेपी ड्रग्स, लैजर थैरेपी, रेडिएशन थैरेपी तथा प्लाक ब्रेचीथैरेपी इत्यादि कारगर रहती हैं। अगर इनमें से कोई भी उपचार प्रणाली इस कैंसर की रोकथाम नहीं कर पाती तो बच्चे की जान बचाने के लिए प्रभावित आँख को निकालना पड़ सकता है। तकरीबन, 25 प्रतिशत बच्चों की दोनों आँखों में यह कैंसर हो सकता है। अत बिल्ली की आँख की चमक जैसा प्रथम लक्षण उभरते ही बच्चे को नेत्र-चिकित्सक के पास ले जाना अत्यंत आवश्यक है। नहीं तो, इस लापरवाही की भारी कीमत अदा करनी पड़ सकती है।

उपचार केन्द्र

आँख के कैंसर से बच्चों की नेत्र-ज्योति और जिंदगी बचाने के लिए भली-भांति प्रशिक्षित नेत्र-चिकित्सक मुंबई, नई दिल्ली, हैदराबाद, चैन्नई तथा बैंगलोर स्थित आँखों के अस्पतालों में प्रयासरत हैं। ये चिकित्सक भरसक प्रयत्न करते हैं कि कैंसर बच्चे के मस्तिष्क या शरीर के अन्य भागों में ना फैलने पाये।

हैदराबाद स्थित एल.वी. प्रसाद आई इंस्टिट्यूट, भारत का एकमात्र नेत्र संबंधी ऑनकोलॉजी सेंटर है, जहाँ प्रति वर्ष तकरीबन 150 बच्चों के आँख के कैंसर का निदान और उपचार किया जाता है। जरूरत है लोगों को इस आँख के कैंसर से संबंधित जानकारी देने की। जिससे अभिभावक इस रोग से पीड़ित बच्चों को समय रहते नेत्र-चिकित्सक के पास ले जायें।