Father and their children

बात शुरू करने के पहले आइये, कुछ तथ्यों पर नजर डाल लेते हैं- भारत के इतिहास का यह पहला ऐसा दौर है जब 20 लाख से ज्यादा विभिन्न क्षेत्रों में ऐसे प्रोफेशनल मौजूद हैं, जिनके घर-परिवार में उनके पहले उनकी तरह का कोई नहीं था।

5 लाख से ज्यादा तो सिर्फ ऐसे आईटी प्रोफेशनल आज भारत और दुनिया में अपने मां-बाप का नाम रौशन कर रहे हैं, जिनके मां-बाप कभी कंप्यूटर और इनफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी का एक लप्ज तक नहीं जानते थे।
1.5 लाख से ज्यादा ऐसे प्रबंधक देश और दुनिया में बड़ी जिम्मेदारी संभाल रहे हैं और सन् 2010 तक इनकी संख्या बढ़कर 4 लाख तक पहुंच जायेगी, जिनकी पृष्ठभूमि में प्रबंधन का संस्कार तो छोड़िए, शाब्दिक ज्ञान भी नहीं रहा।
पिछले 10 सालों में 1000 से ज्यादा ऐसे आईएएस और पीसीएस विभिन्न गांवों, कस्बों से निकले हैं, जिनकी पृष्ठभूमि बेहद मामूली रही है। न तो किसी तरह की कोई प्रशासनिक और न ही शानदार शैक्षिक पृष्ठभूमि रही है।
इस तरह के आंकड़ों की एक बहुत लम्बी श्रृंखला बन सकती है अगर हम हर क्षेत्र में नजर दौड़ाएं। इसलिए निष्कर्ष रूप में यह कहना उचित रहेगा कि आजादी के 60 सालों बाद भारत सचमुच इस समय एक ऐसे युवा-उभार के दौर से गुजर रहा है, जैसे वह पहले कभी नहीं गुजरा। भारत की 55 फीसदी से ज्यादा आबादी 35 साल से नीचे की है और 30 करोड़ तो शुद्ध रूप से ऐसे नौजवान श्रमिक हैं जिनकी किसी भी अर्थव्यवस्था में सर्वाधिक सकारात्मक भूमिका होती है। भारत सिर्फ युवा-उभार से ही नहीं गुजर रहा है, बल्कि हर तरह की जवान हलचल का केन्द्र भी बन चुका है। यह सिर्फ आंकड़े ही नहीं बल्कि विश्व युवा कांग्रेस की रिपोर्ट, विभिन्न देशों के कार्पोरेट जगत का आकलन और भविष्य पर नजर रखने वाले तमाम संगठनों का भी यही कहना है।
इस युवा-उभार का हर क्षेत्र में आमूलचूल फर्क दिख रहा है। लेकिन जो सबसे बड़ा और सबसे निकट फर्क दिख रहा है, वह है सपनों की फ्रेम में पापा की तस्वीर का छोटा पड़ जाना। जी हां, यह बिल्कुल चौंकाने वाला निष्कर्ष लग सकता है, लेकिन सिर्फ इसलिए क्योंकि अभी तक आपने नजर उठाकर इस तरफ देखा नहीं होगा। कभी इस तरह से सोचा नहीं होगा। यह बहुत हैरान करने वाली बात नहीं है। अगर हम अपने इर्दगिर्द की छोड़ें और सिर्फ अपने घर पर ही नजर डालें तो चीजें बिल्कुल दिन के उजाले की तरह साफ हो जायेंगी। आज किसान का बेटा किसान नहीं बनना चाहता। छोटे दुकानदार का बेटा दुकानदार नहीं बनना चाहता। पारंपरिक दस्तकारों के बेटे दस्तकार नहीं बनना चाहते। दर्जी का बेटा दर्जी नहीं बनना चाहता। ऐसे एक-दो-चार या दर्जन भर नहीं बल्कि सैकड़ों पेशे हैं, जिन्हें आज के बच्चे नहीं अपनाना चाहते और अगर अपनाना भी चाहते हैं तो उसमें आमूलचूल परिवर्तन करके। प्यूजन के स्तर पर ही। 
कृषि को लेकर किसी गैर-सरकारी संगठन के आंकड़े नहीं बल्कि नेशनल सैम्पल सर्वे के सरकारी आंकड़े चौंकाने वाले हैं। पंजाब जैसे बेहद कृषि समृद्ध प्रांत में भी किसान का बेटा किसान नहीं बनना चाहता। महाराष्ट्र, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, तटीय आन्ध्र प्रदेश यानी जहां-जहां ग्रीन रिवोल्यूशन हुई है और पुराने आंकड़ों की तुलना में देखें तो धरती सोना उगल रही है, वहां भी किसानों के बच्चे किसान नहीं बनना चाहते। क्योंकि किसानी उनके सपनों के लिहाज से छोटा पेशा हो गया है। हरियाणा, पंजाब, गढ़वाल और हिमाचल प्रदेश में बड़ी तादाद में लोग फौज में जाया करते थे। लेकिन अब फौजियों के बच्चों को फौज आकर्षित नहीं करती। हालांकि इसकी वजह सिर्फ यह नहीं है कि नई पीढ़ी पुरानी पीढ़ी से बेहतर है, वह ज्यादा पढ़ी-लिखी है, उसके सपने बड़े हैं और उसके पास कॅरिअर की एक माहौलजनित गाइडलाइन है। ये तमाम बातें तो हैं ही। यह एक बायोलॉजिकल सत्य है कि हर नई पीढ़ी अपनी पुरानी पीढ़ी से कम से कम डेढ़ गुना सोच और समझ के स्तर पर बेहतर होती है। उसका ज्ञान, उसकी तकनीकी समझ पुरानी पीढ़ी से बेहतर होती है।
अगर बदलाव महज पुरानी पीढ़ी के मुकाबले कुछ ज्यादा होता तो यह स्वाभाविक प्रक्रिया होती मगर हकीकत यह है कि पुरानी पीढ़ी और आज की नई पीढ़ी कई स्तरों पर एक-दूसरे के साथ तालमेल बिठा पाने की स्थिति में ही नहीं रह गयी। इसकी वजह यह नहीं है कि पुरानी पीढ़ी उर्वर, प्रयोगशील और मेहनत के मामले में कहीं पीछे रही है। असल बात यह है कि पिछले दो दशकों में इतना तेज तकनीकी विकास हुआ है, हर क्षेत्र में इतना तेज गुणात्मक परिवर्तन आया है कि नई पीढ़ी पुरानी पीढ़ी के मुकाबले बहुत आगे निकल गयी है। 1980 तक हमारे यहां कंप्यूटरों की तादाद महज कुछ हजार थी। 90 के दशक के शुरू में यह लाख फिर लाखों के आंकड़े में पहुंची और पिछले पांच सालों में कंप्यूटरों की संख्या कई गुना बढ़कर इस समय 5 करोड़ के आसपास पहुंच गयी है। ऐसे में कंप्यूटर, इंटरनेट और इनफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी से जुड़े तमाम दूसरे आयामों में नई और पुरानी पीढ़ी के अनुभवों, ज्ञान के व्यावहारिक स्तर और इस्तेमाल में जमीन-आसमान का फर्क होना ही है। यह सिर्फ बार-बार जिक्र में आ रहा आईटी क्षेत्र ही नहीं है, जहां नई और पुरानी पीढ़ी के बीच हर स्तर पर एक बड़ा फासला हो चुका है बल्कि हर तकनीकी, आर्थिक, सामाजिक और सोच के मनोवैज्ञानिक स्तर तक में नई और पुरानी पीढ़ी के बीच एक बड़ा फासला बन गया है। 60 और 70 के दशक में प्रेम-विवाह एक क्रांति थी। अंतरजातीय प्रेम-विवाह उससे बड़ी क्रांति थी और अंतरधार्मिक विवाह तो एक धमाका था। लेकिन नई पीढ़ी के लिए यह कोई बड़ा मसला ही नहीं है। आपको हैरानी होगी कि नई पीढ़ी की उदार सोच और लचीले रवैये पर पुरानी पीढ़ी भले दबाव बनाये, नाक-भौंह सिकोड़े, उन पर अंकुश का चाबुक कसे, लेकिन नई पीढ़ी वाकई सम्बंधों के इस स्तर पर बहुत उदार हो चुकी है। 60 और 70 के दशक में महज 4 से 5 फीसदी ऐसे नौजवान बमुश्किल नजर आते थे, जो अपनी शादी को लेकर एक पसंद और नजरिया रखते थे। आज मुश्किल से दो-चार फीसदी शहरी नौजवान ही बचे हैं, जो अपनी शादी को लेकर पूरी तरह से मां-बाप पर आश्रित हैं। समाज में वाकई तूफानी परिवर्तन हो रहा है। एक जमाने में महज मुट्ठी भर लोग ही शादियों के लिए अखबारों या मीडिया के दूसरे माध्यमों में विज्ञापन देते थे। आज 50 फीसदी से ज्यादा शहरों में होने वाली शादियां अखबारों और पत्रिकाओं में दिये गये विज्ञापनों के जरिए होती हैं। जब से इंटरनेट भी इनके साथ आ जुड़ा है तो ऐसी शादियों का प्रतिशत बढ़कर 60 से 65 हो चुका है।
भारत में बहुत तेजी से और इतने स्तरों पर एक साथ परिवर्तन घटित हो रहा है कि तमाम पारंपरिक मूल्य, सोच, समझ, स्तर और हर वह पैमाना जो तुलना का जरिया हो सकता था, बुरी तरह से बदल गया है। कभी माओ ने कहा था कि डॉक्टर का बेटा डॉक्टर क्यों बने, किसान का बेटा किसान क्यों बने, मछुआरे का बेटा मछुआरा क्यों बने? ...और इसके लिए उन्होंने एक क्रांति की रूपरेखा तय की। लेकिन हिंदुस्तान में बिना कोई क्रांति का कार्यक्रम बनाये यह क्रांति घटित हो रही है। 90 के दशक से उदारवादी अर्थव्यवस्था का जो सिलसिला शुरू हुआ था, वह अब तेज रप्तार क्रांति का रूप धारण कर चुका है। पहले लोग कहते थे कि जब बेटे के पैर बाप के जूतों में आ जाएं, तो बाप को चाहिए कि वह बेटे को बच्चा न समझे। लेकिन आज जूतों की बराबरी करने तक के लिए रुकने और सोचने का भी वक्त नहीं बचा। आज के किशोर बच्चे एक-दो नहीं बल्कि दर्जनों मामले में अपने पापा से आगे हैं और यह उनकी सिर्फ लापरवाही और नासमझी भर नहीं है बल्कि यह उन्हें मिले तेज विकास के माहौल का नतीजा है। घर में कोई मोबाइल फोन आता है तो बड़ों को उसके फंक्शन सीखने में भले महीनों लगें, लेकिन बच्चे महज कुछ दिनों में उसके मास्टर हो जाते हैं। क्योंकि उनके इर्दगिर्द वो चीजें इस्तेमाल में हैं, वे उन चीजों को बरत रहे हैं जिन चीजों से वास्ता उनके पालकों का उम्र का एक लम्बा अरसा गुजर जाने के बाद जुड़ा है। भले पुरानी पीढ़ी को शिकायत हो कि उनके बच्चे समझ और संस्कार के मामले में बहुत पीछे या लापरवाह हैं, लेकिन हकीकत यह नहीं है। हकीकत यह है कि टेलीविजन की क्रांति ने किशोरों को सामान्य ज्ञान के उस स्तर तक पहुंचा दिया है, जिस स्तर तक एक जमाने में बहुत पढ़े-लिखे लोग पढ़ाई-लिखाई के अंतिम चरण में पहुंच पाते थे।
ज्ञान चाहे इतिहास का हो, चाहे भूगोल का। चाहे तकनीक का हो, चाहे बाजार का। ज्ञान के प्रसार के आज इतने माध्यम मौजूद हैं कि नई पीढ़ी के सामान्य ज्ञान के सामने पुरानी पीढ़ी कहीं नहीं टिकती। इस कारण अपने जमाने में चाहे जितने पारंगत और इंटेलीजेंट आप रहे हों, लेकिन आज पापा के रूप में ऐसे लोगों की तमाम कुशलता दांव पर लग गयी है। उनकी उपलब्धि अचानक छोटी हो गयी है। एक जमाने में अपनी नौकरी के अंतिम पड़ाव पर पहुंच कर लोगों को जितनी तनख्वाह मिलती थी, दर्जनों नहीं सैकड़ों ऐसे क्षेत्र हैं जहां उतनी तनख्वाह आजकल अप्रेंटिस के दौरान मिलती है। एक जमाने में लोग घर तब बनाया करते थे, जब उनकी उम्र जवानी को पार करके अधेड़ावस्था के प्रवेश-द्वार में घुस चुकी होती थी। मगर आज नई पीढ़ी 22 से 32 साल के बीच में अपना खुद का मकान, गाड़ी और इंश्योरेंस कम्प्लीट कर चुकी होती है। बैंकों में बचत के रूप में जमा और बाजार में निवेश के रूप में लगे पैसे को लेकर हुए एक सर्वेक्षण के मुताबिक इस समय बाजार में 15 से 20 फीसदी तक ऐसे युवा सक्रिय हैं, जिनकी उम्र 20 से 30 साल के बीच है जबकि 80 और 90 के दशक में भी बाजार में निवेश करने वाले युवाओं की संख्या बहुत ज्यादा नहीं थी। महज 3 से 5 फीसदी युवा ही थे, जिन्हें इस उम्र में कई तरह की उपलब्धियां हासिल करने का श्रेय मिलता था।
भारत में वाकई युवा क्रांति हुई है। हर क्षेत्र में चाहे क्षेत्र कॅरिअर का हो, निजी और सामाजिक उपलब्धियों का हो, ज्ञान का हो, विज्ञान का हो, चाल-चलन का हो, समृद्धि का हो। हर क्षेत्र में आज युवा अपने मां-बाप के मुकाबले बहुत आगे जा चुके हैं। एक अप्रत्यक्ष रूप से किए गये सर्वे के मुताबिक 70 फीसदी से ज्यादा किशोर ऐसा कॅरिअर चुनना चाहते हैं, जैसा कॅरिअर उनके मां-बाप का न रहा हो और यह आश्चर्य की बात नहीं है कि जब बच्चे अपने मां-बाप से अलग हटकर कॅरिअर चुनने की कोशिश करते हैं तो उनमें से 90 फीसदी से ज्यादा की कोशिश अपने कॅरिअर को वहां से शुरू करने की होती है, जहां पर आकर उनके मां-बाप का कॅरिअर अंतिम ऊंचाई पर पहुंचा था या खत्म हुआ था। यही कारण है कि अब पापा बच्चों के ड्रीम पापा नहीं रहे। ऐसा नहीं है कि बच्चे उन्हें कम प्यार करते हैं, लेकिन आज ज्यादातर बच्चे अपने पापा से अलग और उनसे कई गुना बेहतर कॅरिअर की तलाश में हैं। पापा की तस्वीर उनके सपनों के फ्रेम में बहुत छोटी पड़ चुकी है।