श्रीसीता जी के पास हनुमान जी को क्यों भेजा गया
हनुमान जी रूपी स्वर्ण-मृग दोनों को निकट ले आता है। सीताजी ने इस स्वर्ण-मृग को अपना लिया, पाल लिया। यही स्वर्ण-मृग (हनुमान) हर पल सीता-राम के समीप उपस्थित रहता है। प्रभु श्रीराम मुद्रिका देकर हनुमान जी को जनकसुता के पास क्यों भेजते हैं? इस प्रसंग में निहित प्रभु का उद्देश्य बड़ा अनोखा था। श्रीसीता जी और भगवान श्रीराम के मध्य जिस वियोग की सृष्टि होती है, उसके मूल में `स्वर्ण-मृग' था। सीता जी स्वर्णमृग को देखकर श्रीराम से अनुरोध कर कहती हैं, ``प्रभु! आप इस मृग को यदि जीवित पकड़ कर ले आयेंगे तो मैं इसे पाल लूंगी और यदि मार देंगे तो इसका स्वर्णमय चर्म आपके आसन के काम आयेगा।''
कपट कुरंग कनक मनिमय, लखि प्रिय सों कहति हंसि बाला। पाये पालिबे जोग मंजु मृग, मारेहु मंजुल छाला।। किन्तु श्रीराम ने मारीच को पकड़ने की चेष्टा नहीं की, अपितु उसका वध कर दिया। सीता जी ने बाद में जानना चाहा, ``आपने स्वर्ण-मृग का वध क्यों कर दिया, पकड़ कर लाये क्यों नहीं?'' मृग का अर्थ हिरण भी होता है और वानर भी। प्रभु श्रीराम ने कहा, ``िप्रये! जिस मृग को मार देना उचित था, उसे मैंने मार दिया, परन्तु जो पालने योग्य मृग (हनुमान) था, जो तुम्हारा प्रिय पात्र बनने के योग्य था, उसे तुम्हारे पास भेज दिया।'' प्रभु ने आगे कहा, ``सीते! मारीच में थोड़ा-सा ही स्वर्ण था। विडम्बना यह है कि जब मैंने बाण चलाकर स्वर्ण की परीक्षा की, तो वह स्वर्ण नकली निकला। ऊपर से स्वर्ण अन्दर से राक्षस, तुम्हारे लिये ऐसा स्वर्ण व्यर्थ था। अत हनुमान जी के रूप में असली शुद्ध स्वर्ण का मृग (वानर) भेज दिया, जिसका पर्वताकार सम्पूर्ण शरीर ही स्वर्णमय है।'' हनुमान जी वस्तुत `हेम शैलाभ देहं' के रूप में दिव्य स्वर्ण हैं। आज भी यह स्वर्ण-मृग भक्तों को प्रलोभित कर रहा है। मारीच रूपी नकली स्वर्ण-मृग भक्त और भगवान के मध्य दूरी की सृष्टि करता है, किन्तु हनुमान जी रूपी स्वर्ण-मृग दोनों को निकट ले आता है। सीताजी ने इस स्वर्ण-मृग को अपना लिया, पाल लिया। यही स्वर्ण-मृग (हनुमान) हर पल सीता-राम के समीप उपस्थित रहता है। |
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