लिखा करती थीं, कभी हवाएँ,
जहाँ रोशनी की दास्तां
आज सड़क के,
नुकीले पत्थरों पे खिंची
ख़ौफ की लकीरें
चीड़ वनों में
हर समय आतंकी आभास
व्याकुल हो कसमसाती रात
मानवता के मुख पे
कालिख पोत
स्याह लिबास ओढ़े
क्यों सिसक रही रात
जीते मरते
लोगों से बेखबर
लाशों का लताड़ता
फुफकारता, हुंकारता
बेतहाशा भाग रहा, शहर
मीरा हिंगोरानी,
दिल्ली