रात उनके नाचघर में आ गई वर्षा
लोग कहते हैं, शहर में आ गई वर्षा
चीर दी फिर किस जनक ने भूमि की छाती
बिजलियाँ कड़कीं, अधर में आ गई& वर्षा
झोंपड़ी तक तो न पहुँची, छोड़कर संसद
लुट गई होगी डगर में, आ गई वर्षा
पड़ गईं इतनी दरारें, यह नयी छत भी
कांपती आठों पहर में, आ गई वर्षा
पाप की जिन कोठियों में रोटियाँ गिरवी
सब बदलती खंडहर में आ गई वर्षा
ऊसरों में भी उगेंगी, अब नयी फ़सलें
लहलहाते खेत भर में, आ गई वर्षा
डॉ. ऋषभ देव शर्मा