एक अनुचित सलाह
राजनीति को निरंतर अपनी उग्र टिप्पणियों से गरमाये रखने की कला शिवसेना सुप्रीमो बाला साहेब ठाकरे ब़खूबी जानते हैं। अभी हाल तक वे अपने सगे भतीजे राज ठाकरे से `मराठी-मानुष' के मुद्दे पर जूझ रहे थे कि एकाएक उनके `मराठी मानुष' का `हिन्दुत्व' अपनी उग्र पहचान लिए जाग उठा है। अपने अ़खबार `सामना' के संपादकीय में उन्होंने इस्लामिक आतंकवाद से लड़ने के लिए हिन्दुओं को भी आत्मघाती दस्ता बनाने की सलाह दे डाली है। इस बयान के पीछे ठाणे के गड़करी रंगायतन सभागृह में पिछले दिनों हुए बम-विस्फोट की घटना मुख्य कारक है। थियेटर में एक मराठी नाटक का मंचन हो रहा था, जिसमें कथित रूप से हिन्दू देवी-देवताओं का मज़ाक उड़ाया गया था। इस संदर्भ में चार हिन्दू युवकों को गिरप्तार किया गया है जिन पर पुलिस कथित तौर पर बम-प्लांट करने का आरोप लगा रही है। बम-विस्फोट में घायल होने वाले लोग हिन्दू हैं। प्रतिक्रिया में बाल ठाकरे ने अपने संपादकीय में कहा है कि बम हिन्दुत्व वादियों ने बनाया, यह सुनकर खुशी हुई, लेकिन ये विस्फोट हिन्दुओं को ही घायल करने के लिए किये गये, यह जान कर सर शर्म से झुक गया। उन्होंने अपनी स्पष्ट राय व्यक्त करते हुए कहा है कि हिन्दुओं के खिलाफ इसका इस्तेमाल करने की जगह इसका इस्तेमाल आतंकवाद से मुकाबला करने के लिए होना चाहिए। उनके अनुसार इस्लामिक आतंकवाद बढ़ रहा है, अत उसका मुकाबला हिन्दू आतंकवाद के जरिये होना चाहिए और इसके लिए हिन्दुओं को भी अपना आत्मघाती दस्ता तैयार करना चाहिए। कांग्रेस सहित तथाकथित सभी राजनीतिक दल उनके इस वक्तव्य की घोर निन्दा में तो जुटे ही हैं, हिन्दुत्व के मुद्दे पर हमेशा बगलगीर की भूमिका निभाने वाली भाजपा भी उनकी इस पेशकश से पल्ला झाड़ रही है। भाजपा के वरिष्ठ नेता वेंकैया नायुडू ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा है कि लोगों को क़ानून अपने हाथ में लेने की सलाह नहीं दी जानी चाहए। उनके अनुसार आतंकवाद का मुकाबला करना सरकार का काम है। उन्होंने इस विषय में भाजपा की नीतियों और विचारों को स्पष्ट करते हुए कहा है कि भाजपा लोकतंत्र और संविधान में विश्वास करती है और सहयोगी दल को भी ऐसा ही करना चाहिए। बाल ठाकरे का यह बयान ऐसे समय आया है जब मुस्लिम समाज के धर्मगुरु और बौद्धिक वर्ग खुल कर आतंकवाद के विरोध में सामने आ रहे हैं। पिछले दिनों अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित इस्लामिक शिक्षा संस्थान दारुल-उलूम देवबंद ने मुसलमानों के सभी फिरकों के उलेमाओं और इस्लामिक विद्वानों की एक सभा बुलाकर आतंकवाद और जेहाद को ग़ैर इस्लामिक करार दिया तथा इसका विरोध हर स्तर पर करने के लिए मुसलमानों को उप्रेरित किया। अभी पिछली 31 मई को जमीअते-इस्लामी हिन्द की अगुआई में दिल्ली के रामलीला मैदान में बुलाई गई लाखों मुसलमानों की सभा में इसके खिलाफ फतवा भी जारी किया गया। साथ ही जयपुर के बम-ब्लास्ट के बाद इस घटना का विरोध करते हुए, जिस बड़ी संख्या में सड़कों पर उतर कर मुसलमानों ने अपने प्रदर्शनों से अपना विरोध आतंकवाद के खिलाफ जताया, उससे साफ होता है कि आतंकवाद के चलते बदनाम होती अपनी कौम को बचाने के लिए मुसलमान ख़ुद इससे लोहा लेने को आगे आ रहे हैं। ऐसी हालत में बाला साहेब ठाकरे का बयान उनके इस प्रयास को हतोत्साहित कर सकता है। यह तथ्य भी ग़ौरतलब है कि फतवा जारी होने के बाद आरएसएस प्रमुख सुदर्शन संघ के कई वरिष्ठ नेताओं के साथ जमीअत के दप्तर खुद चल कर बधाई देने पहुँचे थे। इस विषय पर हमेशा उग्रता प्रकट करने वाली विहिप ने भी इसे एक सकारात्मक कदम बताया और भाजपा ने तो बाकायदा अपनी राष्ट्रीय कार्यसमिति की बैठक में प्रस्ताव पास कर इसकी सराहना की। हालांकि राजनीतिक हलकों में बाल ठाकरे के बयान को कोई ख़ास अहमियत नहीं दी जा रही है, फिर भी उनका बयान देश की लोकतांत्रिक मर्यादा को ज़रूर आहत करता है। उन्होंने प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष आतंकवाद के बहाने पूरी मुसलमान कौम को निशाने पर ले लिया है। उन्हें यह गहराई से समझना चाहिए कि जिसे पश्चिमी मीडिया के प्रचार के चलते मजहबी करार दिया जा रहा है, वह मजहबी नहीं सियासी है और उसे सीमा पार से प्रायोजित किया जा रहा है। ज़रूरत इस बात की है कि इससे लड़ने के लिए एक प्रबल राष्ट्रीयता खड़ी की जाए, जिसमें हिन्दू-मुसलमान और किसी भी धर्म-संप्रदाय की विभाजन रेखा न हो। अपने वक्तव्य के जरिये बाला साहेब हिन्दुत्व को जिस कट्टरतावाद से जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं, इतिहास में अपने खिलाफ उसने अनगिनत हिंसक अभियानों का मुकाबला करने के बावजूद अपनी सहिष्णुता की पहचान कभी नहीं छोड़ी। इस वास्तविकता को भी नहीं नकारा जा सकता है कि आतंकवादी कार्यवाहियों में सिर्फ हिन्दुओं ने ही जान नहीं गंवाई है, अपितु बड़ी संख्या में मुसलमान भी मारे गये हैं। उनके हमले अगर हिन्दुओं के श्रद्धा स्थलों पर हुए हैं तो मस्जिदों और दरगाहों को भी उन्होंने नहीं बख्शा है। यह तथ्य भी ध्यान में रखना होगा कि अपनी तमाम नापाक कोशिशों के बावजूद आतंकवादी हिन्दुओं और मुसलमानों को सड़क पर एक-दूसरे के खिलाफ लड़ने को विवश नहीं कर सके। इस तरह के अनर्गल बयान देकर बाला साहेब क्या उन्हीं जेहादी आतंकियों की मदद नहीं कर रहे हैं जो हिन्दू-मुसलमानों को लड़ाकर देश को कमजोर करना चाहते हैं? |
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