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घड़ी की रफ्तार
वह चलता रहता है, निरंतर दिन फिर रात और फिर दिन... दोस्तों! दिन-रात की अजीब गुत्थी जब मानव मस्तिष्क में प्रश्न बनकर खड़ी हुई, तो उसने सर्वप्रथम सूर्य, चंद्रमा, ग्रहों और तारों से दोस्ती की। समय की यात्रा को नापने के लिए अक्ल दौड़ाई गई। पहले सूर्य की परछाईं से दिनों को दो भागों में बांटकर समय को पढ़ने की कोशिश की गई और फिर 3,500 ईसा पूर्व दिन को दोपहर व शाम जैसे टुकड़ों में बांटा जाने लगा। जैसे-जैसे विकास होता गया मनुष्य भी मौसम, साल, महीने, दिन और समय के एक-एक पल को अलग करता गया। समय को नियंत्रित करने की उसकी इसी चाहत ने घड़ी को जन्म दिया। घड़ी के आज के स्वरूप तक की यात्रा पर आइए एक नज़र डालते हैं -
इलेक्ट्रॉनिक घड़ियों के आगमन के कारण वॉच इंडस्ट्री में काफी बदलाव देखने को मिला। 1966 तक घड़ियों की तकनीक में एक और महत्वपूर्ण परिवर्तन आया। स्विस कंपनियों ने क्वार्ट्ज घड़ियों की खोज की, जो काफी सस्ती भी थीं। 90 के दशक में पीए टाइम इंडस्ट्री की मैक्सिमा कंपनी ने `एक्वा गोल्ड' और `स्कूबा' जैसी ब्रांडेड घड़ियां ईजाद कीं, जो दुनिया भर में मशहूर हैं। आज ढेरों प्रकार की इलेक्ट्रॉनिक डिजिटल घड़ियां मौजूद हैं। जिनमें कम्प्यूटर गेम, मोबाइल, टीवी के साथ कई तरह की ऐसी सुविधाएं शामिल हैं, जो समय को बताती ही नहीं बल्कि उस पर अपनी पकड़ भी रखती हैं। बुकमार्क किजिए
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