संप्रग के सहयोगियों की पीड़ा
जब से यह संकेत मिलने शुरू हुए हैं कि संप्रग सरकार की अगुआ कांग्रेस अमेरिकी असैन्य परमाणु समझौते को अमलीजामा पहनाने की दिशा में, वामपंथी दलों के समर्थन वापसी की धमकी को दरकिनार कर, अपने कदम बढ़ा सकती है, तब से सर्वाधिक बेचैनी संप्रग के अन्य सहयोगी दलों के खेमे में महसूस की जा रही है।
वर्तमान राजनीतिक माहौल को देखते-समझते उन्हें समयपूर्व चुनाव में अपनी पराजय स्पष्ट दिख रही है। अगर ऐसा हुआ तो उन्हें भी कांग्रेस के साथ गेहूँ के घुन की तरह पिस जाना होगा। हालांकि वे यह भी चाहते हैं कि परमाणु समझौता होना चाहिए क्योंकि यह देश की ऊर्जा ज़रूरतों को पूरा करेगा। लेकिन वे यह भी नहीं चाहते कि इस मुद्दे पर वामपंथी अपना समर्थन वापस ले कर सरकार गिरा दें। अत एक तरफ वे वामपंथियों को इस बात के लिए मनाने में जुट गये हैं कि अगर सरकार परमाणु सुरक्षा के मानक तय करने की दृष्टि से आईएईए से समझौता करना चाहती है तो वामपंथी इसकी इजाजत दे दें। दूसरी तरफ वे कांग्रेस को भी समझा रहे हैं कि बढ़ती महंगाई का मुद्दा इस समय सर्वाधिक प्रभावकारी है, अतएव चुनाव में जाना आत्महत्या के समान है। वामपंथियों ने तो करुणानिधि के प्रस्ताव को सिरे से ख़ारिज कर दिया है, बच गई कांग्रेस, तो शायद सहयोगी दल उसे कदम पीछे खींचने को राजी कर लें। |
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