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ब़ाकी सिद्द़ीकी की एक ग़ज़ल
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By विनय वीर
प्रकाशित 06/28/2008
 
ख़बर कुछ ऐसी उड़ाई किसी ने गाँव में, उदास फिरते हैं हम बेरियों की छाँव में
नज़र-नज़र से निकलती हैं दर्द की टीसें, क़दम-क़दम पे वो काँटे चुभे हैं पाँव में

ब़ाकी सिद्द़ीकी की एक ग़ज़ल

ख़बर कुछ ऐसी उड़ाई किसी ने गाँव में
उदास फिरते हैं हम बेरियों की छाँव में

नज़र-नज़र से निकलती हैं दर्द की टीसें
क़दम-क़दम पे वो काँटे चुभे हैं पाँव में

हर एक सम्त से उड़-उड़ रेत आती है
अभी है जोर वही दश्त की हवाओं में

चले तो हैं किसी आहट का आसरा लेकर
भटक न जायें कहीं अजनबी फिज़ाओं में

धुआँ-धुआँ-सी है खेतों की चाँदनी ब़ाकी
कि आग शहर की अब आ गई है गाँव में