आरक्षण की लपटों को
जात-पात की भावनाओं को
हवा न दो
थोड़े से सियासी फ़ायदे के लिए
जलाकर राख़ कर देंगीं।

जहान को
सदियों से धधकती
सामाजिक वैमनस्य की आग
परशुराम
को ही
आना होगा
बस, अब और न बहे लहू मासूमों का
और न लुटे घर बेगुनाहों का
सब्र का भी सब्र टूट चुका है
देख खूनी खेल आतंकियों का
शांति, संयम, सौहार्द की भाषा न
समझने वाले
दहशतगर्दों का अंत करने
गौतम, गांधी नहीं
अब `परशु' राम को ही आना होगा।

आत्माराम

हैदराबाद