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सलाखें
कलाकार- अहमद बट, साजिद हसन, जारा शेख, मीरा सौद संगीत-मो. अरशद निर्देशक-शहजाद रफ़ीकी फिल्म `खुदा के लिए' के पश्चात पाकिस्तानी निर्देशक शहजाद रफ़ीकी की फिल्म `सलाखें' भारत में दिखाई जा रही है, जो पाकिस्तान में बहुत चली है। यह दोनों फिल्में एक-दूसरे से भिन्न हैं। `खुदा के लिए' में आधुनिक परिप्रेक्ष्य में मज़हब का मुद्दा गंभीरता से उठाया गया था, तो `सलाखें' में माफिया के शिकंजे में फंसे युवक की मनस्थिति का चित्रिकरण किया गया है। यह युवक एक होनहार छात्र है। परीक्षा लिखते समय उसे किसी के चीटिंग करने के प्रयासों का पता चलता है तो वह जोश में आकर इस कृत्य का विरोध करता है। परंतु उस मासूम युवक को यह पता नहीं है कि इस अनैतिक कृत्य के पीछे मजलिसी माफिया का हाथ है। इस माफिया को युवक के द्वारा विरोध किया जाना अपना अपमान लगता है। जाल बिछाकर वे उसे `नकल' के मामले में फंसाते हैं। उस युवक पर लगे इस लांछन को उसके पिता सहन नहीं कर पाते हैं और उन्हें दिल का दौरा पड़ता है। युवक की माँ पगला जाती है। इस सबके चलते युवक माफिया से बदला लेने की ठान लेता है और उसी गिरोह में शामिल हो जाता है। बस फिर तो फिल्म आम फिल्मों की तरह मसालेदार लगती है। परिचित डगर से गुजरती हुई वह जाने-पहचाने अंत तक पहुँचती है। फिल्म को जानदार बनाने के लिए युवक की प्रेम कहानी भी रखी गई है। प्रेमिका की शादी किसी और से हो जाती है। उसका पति पुलिस अफसर होता है, जो युवक को पकड़ने की कसम खाता है। `सलाखें' का नायक अहमद बट पाकिस्तान का मशहूर मॉडल है और फिल्म में लोगों ने उसे खूब पसंद किया है। अभिनेत्री मीरा का भारत के फिल्म क्षेत्र में कुछ ठीक स्वागत नहीं हो सका, परंतु पाकिस्तान में उसे सराहा गया है। फिल्म में नाच-गाने हैं। हाँ, नर्तकियों की पोशाकें अच्छी हैं। नग्नता का प्रदर्शन नहीं किया गया है। हिन्दी फिल्मों की स्तरीय तकनीकी के आदी दर्शकों को इस फिल्म की तकनीक जँचना थोड़ा मुश्किल है। परंतु, कई जगह उजागर होने वाली सभ्यता और नीति ज़रूर सराहनीय है। पाकिस्तान-भारत के बीच फिल्मों का आदान-प्रदान होना, यह बात अपने आप में महत्वपूर्ण है। बुकमार्क किजिए
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