वाया दार्जिलिंग
कलाकार : के.के. मेनन, सोनाली कुलकर्णी, परवीन दबास, विनय पाठक, संध्या मृदुल संगीत : प्रबुद्ध बैनर्जी निर्देशक : अरिंदम नंदी सजग दर्शकों के ध्यान में अब तक यह बात आ गई होगी कि आजकल अधिकतर फिल्में पाश्चात्य जीवन-शैली पर ही आधारित बन रही हैं, जिनके पात्र, कहानी, संस्कृति और चित्रीकरण की शैली आम दर्शकों को कुछ अटपटी-सी लगती है। हाँ, मल्टीप्लेक्स में दुगने-तिगुने दाम के टिकट लेकर ऐसी फिल्में देखना आजकल फैशन है। ऐसी ही है निर्देशक अरिंदम नंदी की हिन्दी फिल्म `वाया दार्जिलिंग'। यह फिल्म भी शायद ही दर्शकों को लुभा पायेगी। `वाया दार्जिलिंग' शुरू होती है नवविवाहित के.के. मेनन एवं सोनाली कुलकर्णी के हनीमून के दृश्य से। वे लोग अपने घर लौटने की तैयारी में रहते हैं कि अचानक सोनाली को पता चलता है कि उसका पति के.के. मेनन लापता है। पहले एक बार एक टैक्सी वाले से के.के. मेनन का झगड़ा हुआ था और तब से एक अजनबी अक्सर सोनाली का पीछा करता था। क्या के.के. मेनन के लापता होने के पीछे इनमें से किसी का हाथ है? पुलिस इन्स्पेक्टर विनय पाठक के.के. मेनन का पता लगाने में नाकामयाब होता है। दो वर्ष बाद, पुलिस इन्सपेक्टर विनय पाठक अपने दोस्तों के साथ कलकत्ता के एक अड्डे पर बैठकर शराब पीता रहता है। संध्या मृदुल भी बेझिझक उनके साथ शामिल हो जाती है। बातों ही बातों में पुलिस इन्सपेक्टर विनय पाठक दार्जिलिंग में के. के. मेनन के लापता होने का वाकया उन्हें सुनाता है। जिसे सुनकर वे लोग इस बात की कल्पना करने लगते हैं कि यह सब कैसे हुआ होगा? और इस रहस्य को विविध रूप में पेश किया जाता है। कुछ किस्से, जैसे रजत कपूर की कल्पना से उपजी कहानी दिलचस्प लगती है तो कुछ रुचिहीन। पर वास्तविकता क्या है, इस बात को अंधेरे में ही रखा गया है। अंधेरे में छोड़े गये कल्पना के तुक्के पूरी तरह से व्यर्थ लगते हैं। कलाकारों का अभिनय अच्छा है, परन्तु वह दर्शकों को बांधे नहीं रख पाता है। प्रबुद्ध बैनर्जी का संगीतबद्ध किया बंगाली `बॉल' लोकगीत और चित्रा का गाया `बारिश' वाला गीत कुछ ठीक जमे हैं। जिन लोगों को अंग्रेजी पुस्तकें पढ़ने का शौक है, उन्हें इस फिल्म में बिखरी हुई अवस्था में कुछ अच्छी किताबें देखने को मिल जायेंगी। पर क्या इससे फिल्म देखने का उद्देश्य पूरा होगा। |
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