जम्मू-कश्मीर के राजनीतिक दलों ने अमरनाथ यात्रियों की सुविधा के लिए आवंटित जंगल विभाग की जमीन को लेकर जो अपना चरित्र प्रस्तुत किया है, उससे एक बार फिर सांप्रदायिक अलगाववादी ताकतों का हौसला बुलन्द हुआ है। यह ताज्ज़ुब की बात नहीं है कि घाटी में वर्षों से बिखरे हुर्रियत काफ्रेंस के धड़ों ने इस मसले पर आपस में हाथ मिला लिया। हैरत की बात यह है कि इस मसले पर न कोई नमरपंथी रह गया और न कोई चरमपंथी। पूरी घाटी को एक अराजक और हिंसक प्रदर्शन के हवाले कर दिया गया। जानमाल का नुकसान कितना हुआ, इसकी चर्चा करना फिज़ूल है। हमारी राष्ट्रीय अवधारणा और हमारी सदाशयता तथा सहिष्णुता की जमीन किस हद तक दरकी है, इस पर चर्चा करना शायद अधिक सार्थक होगा। जंगल की 100 एकड़ जमीन अमरनाथ यात्रियों की सुविधा के लिए आवंटित करने का प्रस्ताव पीडीपी ने उस समय किया था जब उसके हाथ में जम्मू-कश्मीर के शासन की बागडोर थी। कांग्रेसी मुख्यमंत्री गुलाम नबी आज़ाद ने तो मुप्ती मुहम्मद सईद के प्रस्ताव को कार्यरूप भर दिया है। लेकिन जब राज्य सरकार ने श्राइन बोर्ड के पक्ष में ज़मीन आवंटित कर दी, तो न सिर्फ वह इसके खिलाफ आयोजित आंदोलन  की हिस्सेदार बन गई बल्कि उसने मिली-जुली सरकार से अपने मंत्रियों को वापस भी बुला लिया। हैरत की बात यह भी है कि जो नेशनल काफ्रेंस अपने सेकुलर चरित्र का मुज़ाहरा करते थकती नहीं है, उसने भी इस प्रयास का यह कहते हुए विरोध किया कि यह अवैध रूप से घाटी में हिन्दुओं को बसाने की साज़िश है। ठीक यही बात उछाल कर हुर्रियत काफ्रेंस के दोनों धड़ों ने हिंसात्मक आंदोलन की अगुआई भी की।  

इस आंदोलन का सबसे ख़तरनाक पहलू यह है कि सामान्य स्थिति बहाल करने के लिए इस आवंटन को रद्द करना पड़ा है। मतलब यह कि अलगाववादियों की इस नापाक साज़िश की कदमबोशी करने को राज्य सरकार तो मज़बूर हुई ही है, बहुत हद तक केन्द्र सरकार भी हुई है। राज्यपाल, जो केन्द्र सरकार का नुमाइन्दा होता है और जो अमरनाथ श्राइन बोर्ड का अध्यक्ष भी है, को जलती हुई कश्मीर घाटी को बचाने की गरज़ से आवंटित ज़मीन राज्य सरकार को वापस करनी पड़ी है। अलगाववादी सांप्रदायिक राजनीति के नग्न तांडव ने लगभग एक सप्ताह तक जो विरोध-प्रदर्शन आयोजित किया, उसके सामने लाचार राज्य सरकार को तो घुटने टेकने ही पड़े हैं, केन्द्र के सुरक्षा दस्तों को भी इस हिंसा के सामने अजीब तरह की बेबसी का शिकार होना पड़ा है। वैसे तो घाटी का आतंकवाद कई दशकों से मजहबी चरमपंथ का खेल लगातार खेलता रहा है, लेकिन उसकी कट्टरता का हिन्दू विरोधी स्वरूप जैसा इस बार सामने आया है, उसने यह सवाल ज़रूर खड़ा कर दिया है कि देश की जमीन का यह टुकड़ा क्या सचमुच उसी जमीन का टुकड़ा है जिसे हम भारत कह कर पुकारते हैं?  

कश्मीर को हम भारत का अभिन्न अंग कहते थकते नहीं हैं। लेकिन अपने को भारतीय कहने से परहेज़ करने वाले कश्मीरी अपनी कश्मीरियत पर भारतीयता को तरज़ीह देने को तैयार नहीं हैं। और अगर नहीं हैं तो क्या इसके लिए अकेले वे ही जिम्मेदार हैं? क्या इसके लिए वह सियासत जिम्मेदार नहीं है जिसने घाटी के बाशिंदों को कश्मीरियत का मतलब सिर्फ मुसलमान होना समझाया? असलियत यही है कि जम्मू-कश्मीर भारत सरकार की निगाह में भले ही एक प्रांतीय-प्रशासनिक इकाई हो, लेकिन इस पूरे प्रांत का साफ तौर पर सांप्रदायिक विभाजन हो चुका है। इस विरोध प्रदर्शन के दौरान इसका साफ नज़ारा श्रीनगर और जम्मू की सड़कों पर दिखाई दिया। श्रीनगर में जहाँ मुसलमानों का हुजूम हुर्रियत नेताओं के नेतृत्व में सुरक्षा बलों पर पत्थर उछाल रहा था तो वहीं जम्मू में हिन्दुओं का जत्था विहिप, बजरंगदल और शिवसेना की अगुआई में गरमागरम नारे उछाल रहा था। मुसलमानों का जत्था एक ओर अगर श्रद्धालु तीर्थ यात्रियों पर हमलावर हो उन्हें उत्पीड़ित करने की कोशिशें अंजाम दे रहा था, तो हिन्दुओं का जत्था ऐसा करने पर हज यात्रा तक रोक देने की चेतावनी परोस रहा था।  

गरज़ यह कि एक ही कश्मीर में दो-दो कश्मीर नजर आये। एक मुसलमानों का कश्मीर और एक हिन्दुओं का कश्मीर। यह हालत उस कश्मीर की है जिसे शेष भारत की जनता जिसमें सर्वाधिक संख्या हिन्दुओं की है, अपना पेट काटकर धारा 370 के नाम पर हर सुख-सुविधा के साधन मुहैया कराती आ रही है। कश्मीर की सियासत में दखल देने वाली पार्टियों ने आज कश्मीर को उस मुकाम पर पहुँचा दिया है कि अलगाववादी ताकतें अब उस जमीन पर उगते हुए एक नये कोसोवो का मंसूबा पाल रही हैं। आतंकवाद की शुरुआत ही इस जमीन से हिन्दुओं और कश्मीरी पंडितों का निर्वासन करा कर की गई है। अगर इस जहरीली कोशिश को उसी समय कुचल दिया गया होता और घाटी में सामाजिक संदर्भ को मजहबी इकाई के रूप में तब्दील न होने दिया जाता, तो अमरनाथ की गुफा खोजने वाले मुसलमान गड़रिये की ज़मीन पर तीर्थयात्रियों के ज़ानिब न गोलियाँ दगतीं और न ही पत्थर उछाले जाते।