जमीन ने बाँटा जम्मू-कश्मीर को
अमरनाथ श्राइन बोर्ड को दी गई जमीन के मुद्दे की लड़ाई के अब मायने बदल गए हैं। कश्मीर में अगर यह भारत से आजादी की लड़ाई में बदली है तो जम्मू में कश्मीरी हुक्मरानों से आजादी की जंग में। जमीन के ऑर्डर के कैंसिल होने के बाद हुर्रियती नेताओं ने कश्मीरियों से आह्वान किया कि अगर वे ऐसी ही एकजुटता बनाए रखें तो आजादी उनसे अधिक दूर नहीं है। आजादी की मुहिम की शुरुआत कट्टरपंथी नेता सईद अली शाह गिलानी सेना के कब्जे वाली 8 लाख कनाल जमीन की मुक्ति से करना चाहते हैं। गिलानी ने आह्वान किया है कि कश्मीर में अब सेना को कश्मीर से हटाने आंदोलन छेड़ा जाए। अन्य हुर्रियती नेताओं की भी यही तमन्ना है कि यह आंदोलन भी अमरनाथ जमीन मुद्दे पर छेड़े आंदोलन की तरह हो। जम्मू संभाग में भी धार्मिक मामले की जंग उन अधिकारों की जंग में बदली है जो वे आजादी के बाद से छेड़े हुए हैं। जम्मू स्टेट मोर्चा जैसे गुट जम्मूवासियों में जंग का बिगुल पूँकने की कवायद में जुटे हैं। विरोध प्रदर्शनों में कश्मीरी हुक्मरानों के खिलाफ गुस्सा व नारेबाजी इसका सबूत है। कश्मीर में आजादी समर्थक नारेबाजी और पाक झंडों को फहराने की घटनाएँं स्पष्ट करती हैं कि उन तत्वों को धार्मिक मुद्दे की आड़ में खुलकर खेलने का मौका मिला है जो 1990 के दशक में आजादी के आंदोलन की शुरुआत में जनांदोलन का नेतृत्व करते थे। जमीन के मुद्दे पर 'जीती` गई जंग को कश्मीरी आजादी की दिशा में कदम मानते हैं तो जम्मू को अलग स्टेट बनाने का झंडा बुलंद करने वाले गुट मानते हैं कि यह मौका सबसे अच्छा है जम्मू को अलग राज्य बनाने के आंदोलन को बुलंदी तक पहुँचाने का। |
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