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मां-बाप का सिरदर्द बनतीं बच्चों की फरमाइशें
जुगनू को दिन में परखने की ज़िद करें बच्चे मेरे अहद के बच्चे नहीं रहे परवीन शाकिर का यह शेर आज के बच्चे और उनकी ज़िद्दों व फरमाइशों को बखूबी बयान करता है। लेकिन इससे ज्यादातर मां-बाप की स्थिति साँप के मुँह में छछूंदर जैसी हो गयी है। न निगलते बनता है और न उगलते। बच्चों की फरमाइशें पूरी करें, तो परेशानी (बजट बिगड़ जाता है), न करें तो परेशानी (बच्चों का चेहरा उतर जाता है)। जमाना बदल गया है, हर मां-बाप के मुँह पर बस यही बात है। ज्यादा पुरानी बात नहीं है-बच्चे को किताबें तोहफे में दे दीं और वह खुश हो जाता था। लेकिन आज के बच्चों को सीडी प्लेयर, आईपोड, डिजिटल कैम और महंगे सैलफोन चाहिए। फरमाइशों का सिलसिला यहीं नहीं रुकता। वास्तव में उनकी इन फरमाइशों का कोई अंत ही नहीं है। आप उन्हें जैसे-तैसे करके एक इलेक्ट्रॉनिक आइटम गिप्ट देते हैं, एक हप्ते बाद वह आउटडेटिड हो जाता है। उन्हें उसका रिप्लेसमेंट चाहिए होता है। आखिर उन्हें अपने दोस्तों की बराबरी करनी होती है या उससे आगे निकलना होता है। आपके पास कौन-सी कार है- मारुति 800 या मर्सिडीज बेंज? जैसी आपकी कार वैसी आपकी हैसियत है कि आपके बच्चों की नजरों में यानी अगर अपने बच्चों की नजरों में गिरना नहीं चाहते, तो अपने इस्तेमाल की चीजों को भी लेटेस्ट फैड के स्तर पर रखिये। एक नयी परेशानी यह भी है। कुछ अभिभावकों के लिए तो जॉब से ज्यादा थकाने वाली बात है बच्चों की न खत्म होने वाली फरमाइशें। मीरा सक्सेना बताती हैं, ``मेरी बेटी 35 हजार के सैलफोन की फरमाइश करती रही। इसे लेकर दस दिन तक हम दोनों के बीच तनाव चलता रहा। आखिर मैं उसकी जिद के आगे टूट गयी। मैं जानती हूं कि अफोर्ड करने की हैसियत होने के बावजूद बेजा फरमाइशों को पूरा नहीं करना चाहिए, लेकिन बच्ची को न कह पाना भी तो बहुत कठिन काम है।'' अगर जिदों के चलते कुछ गड़बड़ हो जाए, तो उसका जिम्मेदार कौन है? विशेषज्ञों का जवाब है, माता-पिता। आज तुंत संतुष्टि करने का दौर है। इसमें माता-पिता भी खेल खेलते हैं। वे बच्चों से कहते हैं, ``अगर अच्छे नम्बर लाओगे तो तुम्हे मोबाइल दिया जायेगा।'' यह सही है कि आज के जमाने में बच्चों को पालना अपने आप में चुनौती है। लेकिन बच्चों को यह सिखाना भी तो जरूरी है कि गैर-जरूरी चीजों के लिए जिद नहीं करनी चाहिए। आईपोड, इन्टरनेट, मोबाइल जैसी चीजें बच्चों का स्पोर्ट सिस्टम बन गयी हैं। उन्होंने मानव संपर्क की जगह ले ली है। बच्चों को जब यह मिल जाती हैं, तो वे संतुष्ट हो जाते हैं। इसलिए बच्चों को यह सिखाना आवश्यक है कि संतुष्टि को कैसे स्थगित किया जाये। बहरहाल, मां-बाप की यह परेशानी केवल महानगरों तक ही सीमित नहीं है। छोटे शहरों और कस्बों में भी यही स्थिति है। बुलंदशहर की रानी सिंह के दो बच्चे हैं, 14 और 10 साल के। वे कहती हैं, ``मैं बच्चों की जिद के आगे झुकने को गलत समझती हूं, लेकिन मेरे पति मानते ही नहीं। मेरे बड़े बेटे को पहले गेमब्वाय चाहिए था, अब आईपोड लेने के बाद उसका गेमब्वाय यूं ही पड़ा रहता है। यह महंगे प्रोडक्ट हैं और इनसे वह बहुत जल्द बोर हो जाता है। वह यह अहसास नहीं करता कि ज्यादातर बच्चों के पास वह नहीं है, जो उसके पास है।'' भटिंडा की अजित कौर की शिकायत है, ``मेरा बेटा सुरजीत अभी 16 बरस का भी नहीं हुआ है और उसकी बहुत सारी `जरूरतों' में एक मोटरबाईक भी है। अभी तो मैं उसे टाले जा रही हूं, लेकिन कब तक टाल पाऊंगी कहना कठिन है। मुझ पर बहुत ज्यादा दबाव है। वह भावनात्मक ब्लैकमेल करता है।'' दरअसल, मां-बाप बच्चों के जाल में फंस जाते हैं। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि उनकी फरमाइशों को पूरा किया जाता है, उनकी जिदों के आगे झुका जाता है। इस स्थिति से बचने के लिए सबसे पहले तो बच्चों को अपनी आर्थिक स्थिति से अवगत करा दें। उनके साथ कोई सौदेबाजी न करें, न कोई लालच दें। सिखायें कि वे अपने दोस्तों से प्रतिस्पर्धा न करें। उनकी असल जरूरतों को पूरा करने से कभी पीछे न हटें। बहरहाल, सुरजीत अब देर रात तक डिस्को और पार्टियों में भी जाना चाहता है, क्योंकि ऐसा करना `िहप' है। उससे सख्ती से पेश आने का अर्थ है मां-बेटे में झगड़ा होना और फिर लम्बे समय तक शीत युद्ध का चलते रहना। उस पर सख्त निगाह रखने के अलावा अजित कौर और क्या कर सकती हैं? विशेषज्ञों की राय है, ``यह सुनिश्चित किया जाए कि बच्चों को कोई चीज आसानी से न मिले।'' यह कहना कितना आसान है और करना कितना मुश्किल? |
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