चंद रोज पहले `विश्व वृद्ध दिवस' मनाया गया था। हिन्दुस्तान में आजकल सारे ही `विश्व-दिवस' मनाए जाने लगे हैं। बाल-दिवस, श्रम-दिवस, महिला-दिवस, पिता-दिवस, मातृ-दिवस वगैरह-वगैरह।
चंद रोज पहले `विश्व वृद्ध दिवस' मनाया गया था। हिन्दुस्तान में आजकल सारे ही `विश्व-दिवस' मनाए जाने लगे हैं। बाल-दिवस, श्रम-दिवस, महिला-दिवस, पिता-दिवस, मातृ-दिवस वगैरह-वगैरह। `वृद्ध-दिवस' के म़ौके पर जब कुछ बुज़ुर्गों को सम्मानित किया गया तो बहुत अच्छा लगा। बुज़ुर्गों को करीब से देखने का भी अवसर मिला। मुशीराबाद स्थित एक वृद्धाश्रम में बुज़ुर्गों को हँसते-खेलते देखकर जाने क्यों बचपन के वे दिन याद आ गये, जब दादाजी सर्दी के दिनों में हमें अपनी गोद में लिहाफ़ की गर्मी देते हुए भजन गाते थे। बहुत से भजनों के मुखड़े हमें याद हैं, जो उन्हीं दिनों के सुने हुए हैं। नये ज़माने में दादाजी की गोद भले ही बचपन का इंतज़ार कर रही हो, बचपन के पास तो उस गोद के लिए समय ही नहीं है। आज का बचपन तो स्कूल, प्री-स्कूल, ट्यूशन और भविष्य की जटिल तैयारी के लिए रिज़र्व हो चुका है। होम में `स्कूल वर्क', नाम है - `होम वर्क।' यानी घर बेगाना हो गया, पूरे समय स्कूल बच्चों के ज़ेहन पर हावी हो गया। बच्चे ही आगे चलकर बुज़ुर्ग बनते हैं। लेकिन क्या कभी समाज ने यह भी सोचा है कि एक `सीनियर सिटिज़न' के निर्माण पर कितना खर्च होता है? इसका राई-रत्ती हिसाब तो किताबों (बहीखाते) में भी नहीं मिलेगा। लेकिन एक बचपन पर हो रहे खर्च पर नज़र डाल कर यह अंदाज़ लगाया जा सकता है कि एक `सीनियर सिटिज़न' कितनी क़ीमत में तैयार हुआ होगा।
हाल ही में और कदाचित `िवश्व वृद्ध-दिवस' की पूर्वसंध्या पर ही `असोचम' के `सोशल डेवलेपमेंट फाउण्डेशन' ने जवान माता-पिता (पैरेन्ट्स) के बच्चों पर होने वाले स्कूल खर्च पर एक सर्वे करवाया और पाया कि बच्चों का स्कूल खर्च युवा दम्पत्तियों को परिवार-नियोजन के लिए मजबूर कर रहा है। अगर रिपोर्ट सही है, तो इसे यूँ भी कहा जा सकता है कि जो काम परिवार-कल्याण के घोषित उपाय नहीं कर पाए, वही काम बच्चों की पढ़ाई का खर्च करवाए दे रहा है। `महंगी पढ़ाई बनाम कम बच्चे' का यह समीकरण कैसे काम कर रहा है, इसका ब्यौरा एक बड़े राष्ट्रीय अंग्रेजी दैनिक के अनुसार कुछ यूँ है :-
सर्वे कहता है कि सन् 2000 में ट्यूशन खर्च छोड़कर स्कूल खर्च एक बच्चे पर पड़ता था, करीब 25,000 रुपये सालाना। अब सन् 2008 में वह बढ़कर सालाना 65,000 रुपये हो गया है। लेकिन अभिभावकों की वार्षिक आमदनी उसी अनुपात में नहीं बढ़ी। स्कूल खर्च जहाँ लगभग तीन गुना बढ़ा है, वेतन में वृद्धि बहुत से बहुत 28 से 30 प्रतिशत हुई है। सर्वे कहता है कि पालक साफ-साफ महसूस करने लगे हैं कि एक बच्चे का स्कूल खर्च उठा पाना ही दुश्वार होता जा रहा है, तो अक़्लमंदी इसी में है कि बच्चे कम से कम पैदा किये जाएँ। सर्वे का दावा है कि उसने तमाम बड़े शहरों और महानगरों में करीब 2000 पालकों का इंटरव्यू लिया। ज़ाहिर है कि जिन अभिभावकों से भेंट-मुलाकात की गई, वे मध्यम वर्ग में उच्च स्तर पर रहे होंगे। आम नौकरी पेशा परिवार के लिए बच्चों की पढ़ाई पर इतना खर्च करना कहाँ सम्भव होता है। सर्वे खुद बयान करता है कि 65 प्रतिशत पालक अपना पेट काट कर बच्चों को पढ़ा रहे हैं, यानी आधी से ज़्यादा तनख्वाह उन्हें बच्चों की पढ़ाई पर खर्च करनी पड़ रही है। बड़े स्कूलों में अपने बच्चों को भेजने वाले पालक भी कहते हैं कि पढ़ाई ने परिवार का बजट बिगाड़ दिया है। कुछ सारांशित आँकड़े भी दृष्टव्य हैं। एक बच्चे की यूनिफार्म पर 2,500, जूतों पर 3,500, बस्ता/बोतल पर 1,500, खेल-कूद के सामान पर 2,000, स्कूल ट्रिप्स पर 2,500, स्कूल क्लब पर 1,500, टेकनोलॉजी पर 1,500, लंच और परिवहन पर 32,800, इसके अलावा बिल्डिंग फंड, फेयर आदि पर 13 हज़ार का और खर्च आता है। इसके अलावा भी बहुत से `हिडेन' (छिपे हुए) खर्च हैं। आज करीब 3 करोड़ बच्चे खानगी स्कूलों में पढ़ते हैं। दशा यह है कि अच्छे खानगी प्री-स्कूलों में ही तीन से पाँच साल की उम्र वाले एक बच्चे की पढ़ाई पर 25 हजार रुपये खर्च आता है।
यह स्थिति देखकर बचपन में सुना एक मुहावरा याद आता है। अपनी पढ़ाई पर कटाक्ष होते देखकर लोग बतुर्की जवाब देते थे, ``हाँ, भैया हम तो सांवां देकर पढ़े हैं, ये अशर्फी देकर।'' शिक्षा, खासतौर पर आज़ादी के बाद वाले सालों में कभी पालकों को पहाड़ जैसी नहीं दिखती थी। माना कि तब आमदनी भी कम थी और पढ़ाई का स्टैंडर्ड भी। आज की तरह बस्ता ऐसा नहीं होता था कि उसे पीठ पर लादे हुए बच्चे `हमाल' या `पर्वतारोही' जैसे लगें। फिर भी जो माता-पिता अपने बच्चों को पढ़ाते थे, उन्हें लगता ज़रूर था कि जीवन के शेष कई शोबों में कटौती और किफ़ायत करके ही वे अपने बच्चों को पढ़ा रहे हैं। तब के पढ़े-लिखे वे बच्चे ही आज बुजुर्ग हो चुके हैं। उन्होंने अपने जीवन-काल में चाहे जो कुछ कमाया, उड़ाया और गंवाया हो, एक बात तो तय है कि लागत के हिसाब से आज का हर बूढ़ा, आज के बच्चों के मुकाबले बहुत कीमती है। उस वृद्ध के `वाइटल' ऑर्गन्स में से कभी कोई बिगड़ जाता है तो उसे सुधरवाने पर जो खर्च आता है, उसी से अंदाज़ा लगाया जा सकता है। चलिए, नश्वर देह के हिस्सों की ही कीमत लगा लें। लाखों का गुर्दा, करोड़ों का दिल, हज़ारों की आँखें। अगर हर वृद्ध यह घोषित कर दे कि मरने के बाद वह अपना शरीर चिकित्सा जगत को दान कर देगा, ताकि उसके अंग-प्रत्यंग ज़रूरत मंदों को मुप़्त में निकाल कर लगाये जा सकें, तो मानवता पर कितना उपकार होगा।
लेकिन हम ऐसी अपसंस्कृति के शिकार होते जा रहे हैं, जिसमें बुजुर्गों को घर से बाहर करके अनाथालयों और वृद्धाश्रमों में पहुँचाया जा रहा है। जरा सोचिए, जिस तरह परिवार आज बुढ़ापे को अपने आँगन से बाहर कर रहे हैं, उसी तरह यदि इन बुजुर्गों ने बोझ समझ कर बच्चों को घर से निकाल दिया होता, तो क्या होता? तब किस तरह का समाज बनता? आज स्कूल और प्री-स्कूल स्तर से ही महंगी शिक्षा पाने वाले बच्चे जब खुद बुज़ुर्ग बनेंगे तो उस वक़्त उन पर आई हुई लागत के हिसाब से वे कितने मूल्यवान होंगे, इसका हिसाब क्या नहीं होगा? इसी क्रम में हम एक उदाहरण देकर अपनी बात खत्म करना चाहते हैं। इन पंक्तियों के लेखक के सामने ऐसा हुआ है। एक सज्जन अपनी बिगड़ी हुई औलाद को रास्ते पर लाने के लिए उसे ऊँच-नीच समझाते हुए कुछ कह रहे थे। उनका कहना था कि `िजतना इन्वेस्टमेंट करके उन्होंने अपने लड़के को 25 साल की उम्र तक पहुँचाया है, वह व्यर्थ हो गया। लड़के की परवरिश करने की जगह 25 साल पहले उन्होंने एक पौधा रोपा होता, तो वृक्ष बनकर वह आज छाया भी देता और ईंधन भी।' लेकिन .....शेष आप समझें........।