हैदराबाद रियासत के सातवें नवाब मीर उस्मान अली खां को यदि संसार भर के महा-कंजूसों का सम्राट कहा जाए, तो कोई अचरज की बात नहीं होगी। वह अरबों का मालिक था, लेकिन बेहद कंजूस था।
हैदराबाद रियासत के सातवें नवाब मीर उस्मान अली खां को यदि संसार भर के महा-कंजूसों का सम्राट कहा जाए, तो कोई अचरज की बात नहीं होगी। वह अरबों का मालिक था, लेकिन बेहद कंजूस था। उसकी कंजूसी के दिलचस्प, हास्यास्पद और विचित्र किस्सों की जितनी चर्चा देश-विदेश में हुई है, उतनी शायद ही किसी अन्य शासक के बारे में हुई हो।
उसके सिर पर हरदम एक ही धुन सवार रहती थी कि विरासत में मिली बेशुमार दौलत को किस तरह बढ़ाया जाए। इसके लिए उसने बड़े अजीबो-गरीब तरीके अपना रखे थे। वह अपने विशिष्ट दरबारियों और रियासत के नामी-गिरामी रईसों को अक्सर दावतें देता रहता था तथा मेहमानों को अपने हाथों से शराब के जाम बना कर देता था, लेकिन दूसरे ही दिन निजाम द्वारा दिए गए इस सम्मान के बदले निजाम को एक भारी रकम भेंट करनी पड़ती थी। इस तरह एक-एक दावत से उसे पांच-छ लाख रुपये मिल जाया करते थे।
धन प्राप्त करने के चक्कर में यह कंजूस निजाम अपनी प्रतिष्ठा को भी दांव पर लगाने से संकोच नहीं करता था। कहते हैं, एक दफा नज़राने में मिली एक मोहर छिटक कर नीचे गिर गई, तो उसने बौखला कर मोहर को ढूंढना शुरू कर दिया। हद तो उस समय हुई, जब घुटनों के बल झुक कर तख्त के नीचे जा पहुंचा। जब तक उसने मोहर को ढूंढ़ नहीं लिया, उसके चेहरे पर रौनक नहीं आयी। ऐसी घटिया हरकतें करने में वह जरा भी शर्म महसूस नहीं करता था।
रियासत के अमीर लोगों को ब्याह-शादी या अन्य खुशी के मौकों पर वह उपहार भेजना कभी नहीं भूलता था। जाहिर है, वह उपहार अत्यन्त सस्ते होते थे और लोगों को धन्यवाद के रूप में उसे बहुमूल्य उपहार देने के लिए बाध्य होना पड़ता था। कई बार शादी-ब्याह के मौकों पर स्वयं उपस्थित हो जाने पर वह बिना किसी हिचक के दहेज में मिले महंगे गहनों को उठा लेता था।
वह घटिया सिगरेट पीता था, लेकिन आश्चर्य की बात तब होती, जब वह मेहमानों द्वारा फेंके गए अधजले सिगरेट के टुकड़ों को उठा कर पीने लग जाता था। यदि कोई मेहमान उसे कीमती सिगरेट पेश करता तो वह बिना झेंप प्रकट किए एक की बजाय चार-पांच निकाल लेता था। उसके बारे में मशहूर था कि वह अपनी बेगमों की थालियों में से रोटियों को उठा कर खा जाता था। उसका कहना था कि ज्यादा रोटियां खा कर वे मोटी हो जाएंगी।
उसके पास बड़े-बड़े शानदार महल थे, लेकिन खुद वह ऐसे घटिया कमरे में रहता था, जहां उसका साधारण नौकर भी रहना पसंद नहीं करता था। उसके घुटन भरे कमरे में एक ढीली-ढाली चारपाई, गंदा-सा बिस्तर, दो मामूली कुर्सियां और एक छोटी मेज थी। अपार संपदा का स्वामी होते हुए भी वह मामूली बर्तनों में खाना खाता था। अपने अति विशिष्ट मेहमानों तक को वह एक प्याली चाय और एक बिस्कुट देता था। दुबला-पतला, साधारण कद-काठी का यह अरबपति निजाम कपड़ों के मामले में भी अपने कंजूस स्वभाव के कारण बेहद उदासीन रहता था।
वह मोटे कपड़े का ढीला-ढाला पायजामा और कमीज पहना करता था। सिर पर झब्बेदार लाल तुर्की टोपी पहनी होती थी, जिसके बारे में जानकारों का कहना था कि वह कम से कम 30-35 वर्ष पुरानी थी। वह टोपी फट चुकी थी और खस्ता हाल में थी, लेकिन निजाम को बेहद पसंद थी। उसकी कंजूसी के इतने किस्से हैं जिसकी अलग से एक किताब बड़ी सरलता से तैयार की जा सकती है।