Movie Review of Hindi Movie Jane tu ya jane na

कलाकार : इमरान खान, जेनिलिया, शांता पाठक, मंजरी फडणीश, रत्ना पाठक, नसीरुद्दीन शाह

संगीत: ए.आर. रहमान

निर्देशन: अब्बास टायरवाला

लेखक-निर्देशक अब्बास टायरवाला की पहली फिल्म `जाने तू... या जाने ना' एक ऐसी फिल्म है, जिसकी कहानी की मुख्य धारा से जुड़े कई पात्र एवं प्रसंग दर्शकों पर अपनी छाप छोड़ते हैं। दर्शकों को उन पर विशेष गौर करना चाहिए। यह कॉलेज के ऐसे छात्रों की कहानी है, जो रईस हैं, मोटरों में घूमते हैं। बंगलों में बात-बात पर पार्टी करते हैं। ये लड़के-लड़कियाँ बिना किसी संकोच के एक साथ शाम-सवेरे घूमने-फिरने में लगे रहते हैं। पढ़ाई करते हुए कभी नहीं दिखाई देते। माता-पिता ने भी उन्हें मनमानी करने की छूट दे रखी है। इतना ही नहीं, कॉलेज की पढ़ाई खत्म होते ही वे नौकरी या आगे की पढ़ाई की नहीं, बल्कि अपने ब्याह की सोचने लगते हैं।

छात्रों के ऐसे समूह में है- इमरान खान और जेनिलिया। दोनों के स्वभाव भिन्न हैं, पर वे गहरे दोस्त हैं। एक-दूसरे के लिए उचित प्रेमी की खोज करने में लगे रहते हैं। अब गौर करें, कहानी से जुड़ा हिंसा-अहिंसा का मुद्दा। इमरान, राठौर घराने का वंशज है। पिता नसीरुद्दीन शाह राजपूत है, जो अपनी वीरता के लिए ख्यात है और पत्नी रत्ना पाठक हिंसा-प्रवृत्ति का कटु विरोध करने वाली है। वह पुलिस की हिंसा का भी हमेशा विरोध करती है और बेटे इमरान को अहिंसक बनाये रखती है।

लेकिन इमरान की दोस्त जेनिलिया को मारपीट व गाली-गलौच की आदत है और वह दोस्त इमरान को कायर समझती है। कैसे जेनिलिया के मन में मर्दानगी के संबंध में बसा भ्रम दूर होता है, कैसे अहिंसक इमरान को हिंसा का साथ देना पड़ता है, यह दृश्य विचारणीय है। इसके अलावा फिल्म से जुड़े अन्य दृश्यों में शामिल हैं, शराबी पति और पत्नी की ज़िन्दगी। अपने घरवालों से निर्लक्ष्य किये हुए युवक (स्मिता पाटिल-राज बब्बर का बेटा) का अकेलापन आदि। इनके कारण फिल्म स्तरीय बन पायी है।

इमरान खान का सहज अभिनय और उसकी सादगी प्रभावित करती है और जेनिलिया भी कुछ कम नहीं है। फिल्म का युवा माहौल अंत तक बना रहता है। ए.आर. रहमान के तीन-चार गीत लोगों की जुबां पर चढ़ चुके हैं, लेकिन गाने कुछ कम होते और संकलन कुछ मजबूत होता तो फिल्म काफी प्रभावशाली बन सकती थी। जो भी हो, इमरान का प्रवेश हिन्दी-फिल्मों के लिए स्वागत योग्य है।