Ravina with Kids

मस्त मस्त गर्ल कहलाने वाली अभिनेत्री रवीना टंडन लंबे अरसे बाद लोगों के सामने आने की कवायद तो कर रही थीं, पर फिल्मों की जगह टीवी पर उनकी वापसी चौंकाने वाली है। मशहूर फिल्म वितरक अनिल थंडानी से विवाह करके वे परदे से दूर हो गयीं पर आज भी लोग उनकी फिल्मों के ही नहीं बल्कि उनके व्यवहार और सादगी के भी दीवाने हैं।

नाइन एक्स के नए रिएल्टी शो चक दे बच्चे की जज की भूमिका में वे जब सामने आयीं तो उनके लिए यह किसी शो की जजिंग का मामला नहीं था बल्कि उनका मानना है कि वे तो बच्चों की प्रतिभा की कायल हैं और हमेशा से ही बच्चों से प्रेम करती रही हैं।

फिल्मों की जगह टीवी पर वापसी?

(वे हंसती हैं) मेरे पति और मैं फिल्मों के साथ हमेशा से जुड़े रहे हैं। यह मेरे लिए मुश्किल नहीं, पर मैं चाहती हूँ कि कोई ऐसा काम तो हो जिसके साथ वापसी सुखद अहसास हो।

बच्चों के एक शो में जज बनने का क्या अहसास है?

रोमांचक। इससे पहले मैं बच्चों की बाल फिल्म समिति की अध्यक्ष भी रह चुकी हूँ। मेरे लिए बच्चों के साथ काम करना खुद को अपने बचपन को दोहराने जैसा है। इसकी वजह है कि मैं खुद दो बच्चों की माँ भी हूँ। 

आपको लगता है कि टीवी के बाज़ार में ऐसे शो अब प्रतिभा को सामने लाने का काम ईमानदारी से कर रहे हैं?

एकदम। हम जब बच्चे थे तो शायद हमें हमारे परिवार में तेल वाली चोटी बांधने के अलावा कुछ नहीं आता था, पर आज समय बदल गया है। मेरे पिता ने जब मुझे फिल्मों में आने की इजाजत दी तो दर्जन भर हिदायतें भी उसके साथ थीं, पर अब ऐसा नहीं हैं अब माँ-बाप अपने बच्चों की प्रतिभा को निखारने के लिए फिल्म और टीवी पर भरोसा कर सकते हैं।

आपने अपने कॅरियर में बतौर अभिनेत्री, निर्माता और अब सामाजिक कार्यकर्ता की भूमिका में कितना भरोसा किया?

(हंसती हैं) मैं जब फिल्मों में काम करती थी तो हमेशा ही अपने चरित्र और भूमिकाओं को चुनने में सावधानी बरतती थी। शायद इसीलिए मैंने दमन और सत्ता जैसी फिल्में कीं।

आपकी जो छवि मोहरा के बाद बनी उसे आप लंबे समय तक नहीं तोड़ सकीं?

यह होता है। हमारे यहाँ फिल्म उद्योग एक विशेष पूर्वाग्रह के साथ काम करता है। आज भी जो लोग काम कर रहे हैं उनके बारे में माना जाता है कि वे दूसरी किसी भूमिका में फिट नहीं होंगे, पर मैंने उसके बाद भी दमन और सत्ता जैसी फिल्में कीं। मैं भाग्यशाली थी कि मैंने अपने कॅरियर में मोहरा के साथ-साथ अंदाज़ अपना-अपना और खिलाड़ियों के खिलाड़ी जैसी जो फिल्में कीं वे लोगों को पसंद ही नहीं आयीं बल्कि उन्होंने सफलता के नए कीर्तिमान भी बनाए।

आप अपने को एक संतुष्ट अभिनेत्री मानती हैं?

नहीं। बतौर अभिनेत्री शायद नहीं। मैंने अपनी शुरुआत पत्थर के फूल जैसी फिल्म से की। उसमें सलमान मेरे हीरो थे और उसके बाद मैंने दमन जैसी फिल्म में राष्ट्रीय पुरस्कार जीता। लोग कहते हैं कि मैंने केवल ऐसी फिल्में कीं जो केवल मुख्यधारा के सिनेमा की थीं, पर जब अक्स में मैंने अपनी परफॉर्मेंस के लिए फिल्म फेयर का स्पेशल अवार्ड जीता तो लोगों को लगा कि मैं दूसरे सिनेमा में भी बेहतर काम करने वाली अभिनेत्री हूँ।

आपकी तेलुगू फिल्में?

वे मेरे कॅरियर का नया अनुभव थीं। मैंने दक्षिण भारत की अभय, आकाशा विधिलो और आलाबंधन जैसी जो फिल्में की वे सभी हिन्दी में बनायी गयीं। यह कम बड़ी बात नहीं।

आपके लिए अपने कॅरियर की कौन-सी फिल्में हैं, जो आप मानती हैं कि आप वे न करतीं तो आपको अफसोस होता?

ऐसी कई फिल्में हैं। जहाँ तक व्यावसायिक सिनेमा की बात है तो उनमें मोहरा ने मुझे स्टार बनाया और संध्या, घात के साथ शूल और सत्ता जैसी फिल्में मुझे बतौर अभिनेत्री साबित करने में आधार बनीं।

आप बच्चों के शो की जज हैं और इससे पहले बच्चों की बाल चित्र समिति की अध्यक्ष रही हैं, पर हमारे यहाँ बच्चों को लेकर अब पहले जैसी फिल्में नहीं बनती?

ऐसी बात नहीं। तारे जमीं पर हमारे यहाँ ही बनी है और अब भूतनाथ जैसी फिल्म आ रही है। यही नहीं ब्लू अंब्रेला और कई दूसरी फिल्में भी बनी हैं। यह ज़रूर है कि अब जागृति, किताब या ऐसी दूसरी फिल्में कम बनती हैं। यह बाज़ार का दबाव कहा जा सकता है पर समय के साथ पसंद बदल जाती है। शायद आज जागृति जैसी फिल्में न चलें।

सारी नामी हीरोइनें लौट रही हैं आपकी वापसी कब होगी?

अभी तो मैं अपने परिवार और बच्चों के साथ बिजी हूँ लेकिन जब भी कोई अच्छी पटकथा या मौका मिलेगा तो ज़रूर वापसी होगी।