आखिर ना ना करते स्मृति ईरानी क्योंकि... में तुलसी की भूमिका में फिर वापस आ गयी।
मिस इंडिया बनने का सपना देखने वाली और अभिनय के अलावा राजनीति में दखल देने वाली स्मृति पिछले दिनों स्टार पर अपने खुद के प्रोडक्शन हाउस के पहले धारावाहिक `थोड़ी-सी ज़मीन थोड़ा सा आसमान' के लिए चर्चा में रहीं और उसके बाद अपने सोनी के दूसरे शो विरुद्ध के लिए।
आखिर ना ना करते स्मृति ईरानी क्योंकि... में तुलसी की भूमिका में फिर वापस आ गयी।
मिस इंडिया बनने का सपना देखने वाली और अभिनय के अलावा राजनीति में दखल देने वाली स्मृति पिछले दिनों स्टार पर अपने खुद के प्रोडक्शन हाउस के पहले धारावाहिक `थोड़ी-सी ज़मीन थोड़ा सा आसमान' के लिए चर्चा में रहीं और उसके बाद अपने सोनी के दूसरे शो विरुद्ध के लिए। लेकिन नाइन एक्स पर अपने नए शो मेरे अपने के लिये चर्चित और उसी चैनल पर जलवा नाम के रिएल्टी शो में साक्षी तंवर के साथ एंकरिंग करने वाली स्मृति अब एक बार फिर न केवल क्योंकि की `तुलसी' बल्कि अपने नए शो `सक्कूबायी' और जी के शो `बहूरानियां' में उनकी भूमिका बृंदा मौसी के लिए चर्चा में हैं।
वे चलते रहेंगे। ज़ी और दूसरे चैनलों पर चल रहे शोज के बारे में अपनी प्राथमिकताएं हैं। मैं उनमें काम करती रहूँगी।
तब शायद मुझे तुलसी के चरित्र की ताकत के बारे में अंदाजा नहीं था, पर लोगों के लिए मुझे लौटना पड़ा।
(हंसती हैं) एकता मेरी दोस्त हैं। मैंने अपने कॅरियर की ही नहीं बल्कि अपने प्रोडक्शन हाउस की शुरुआत भी उनके साथ ही की थी। दोस्ती में पैसा नहीं आता। जो कुछ भी हुआ वह कोई इशू नहीं था, बस प्राथमिकताएं बदली गयी थीं। अब सब ठीक है। रही पैसे की बात तो भगवान ने मुझे काफी दिया है। मैं पैसे के लिए नहीं कॉज के लिए काम करती हूँ।
(हंसती हैं) नहीं। मेरे पास कुछ फुरसत थी और बृंदा की भूमिका मुझे अच्छी लगी। परेशजी और स्वरूप से मेरे अच्छे संबंध भी हैं इसलिए मैं मना नहीं कर पायी।
यह अपने परिवार और बच्चों को एक हादसे में खो चुकी महिला है। जब वह इस परिवार में अपनी भानजी से मिलने आती है तो एक परिवार को बिखरते नहीं देख पाती। वह उसे सहेजने में लग जाती है। यह आसान भूमिका नहीं है, इसकी चुनौती बड़ी है।
मैंने अपने कॅरियर में अब तक जितने भी चरित्र किए वे सब समाज के महत्वपूर्ण चरित्र हैं, जो एक भारतीय स्त्री के साहस और अस्मिता को दिखाने वाले हैं। तुलसी तो एक आदर्श बन गयी है और उमा के बाद वसुधा ऐसी पात्र है, जो अपने होने के लिए समाज और दुनिया में अपने ही लोगों से एक लड़ाई लड़ रही हैं। इसी तरह मेरे अपने की शारदा और अब बृंदा मौसी भी अपने ही परिवार में रिश्तों का अर्थ तलाश रही है।
अगर मैं ऐसा कर पा रही हूँ तो यह मेरे शोज की सफलता है। आखिर हम फिल्म और टीवी का इस्तेमाल सामाजिकता के लिए करने लगे हैं। शायद इसीलिए आज भी तुलसी नाम की महिला साठ साल के बाद भी नायिका है, जबकि उमा और वसुधा युवा पीढ़ी की प्रतिनिधि हैं। इसी तरह बृंदा और शारदा भी जानती हैं कि रिश्तों की परिभाषा क्या होती है?
(हंसती हैं) मैं सिर्फ स्मृति मल्होत्रा और दो बच्चों की माँ हूँ और मेरा एक परिवार है। परिवार से अलग फुरसत मिलती है तो बस अपना काम करना चाहती हूँ।
ऐसा नहीं है, मैंने टॉक शो किए और धार्मिक धारावाहिक भी किए, पर मैं अपनी मर्जी का काम करना चाहती थी। कुछ दिल से और जिम्मेदार कौन ऐसे ही शो थे। हाँ, थियेटर की फुरसत नहीं मिलती।