फिल्म बेताब से अपने कमर्शियल फिल्मी कॅरियर का सफर शुरू करने वाले अभिनेता अनु कपूर आज पचास साल से ऊपर के हैं और आज भी वे किसी काम में बेवजह हाथ नहीं डालते। शायद यही वजह है कि जी टीवी पर जब उनके करीब सोलह साल पुराने शो अंताक्षरी . .
फिल्म बेताब से अपने कमर्शियल फिल्मी कॅरियर का सफर शुरू करने वाले अभिनेता अनु कपूर आज पचास साल से ऊपर के हैं और आज भी वे किसी काम में बेवजह हाथ नहीं डालते। शायद यही वजह है कि जी टीवी पर जब उनके करीब सोलह साल पुराने शो अंताक्षरी की समाप्ति हुई तो उन्होंने उसे बिना किसी विवाद के अपने निर्माता दोस्त गजेन्द्र सिंह के साथ स्टार वन पर स्थानांतरित कर लिया। यह अलग बात है कि उनके इस शो की लोकप्रियता नहीं दोहरा पाए पर इसके अलावा बाकी चैनलों पर चल रहे उनके शो की लोकप्रियात बरकरार रही।
उनके डीडी के स्मार्ट श्रीमती और हाल के सब-टीवी के एक्टिंग की फनशाला के अलावा पाकिस्तान के शो की एंकरिंग के लिए वे चर्चा बटोरते रहे लेकिन इस बार उनकी चर्चा जरा ज्यादा इसलिए हो रही है कि उनकी एंकरिंग वाले एनडीटीवी के नए रिएल्टी संगीत शो `जुनून कुछ कर दिखने का' में वे अपनी उसी पुरानी रंगत में हैं जैसे अपने शुरुआती दिनों में थे। इसकी वजह है कि इसमें इस बार सूफी, लोक और फिल्म संगीत का मिलाजुला मेल देखने को मिल रहा है।
हाँ। अपने रंगमंच के दिनों में मैं अपने दोस्तों और भाई के साथ गीत गजलों की महफिलों में शामिल होता रहा हूँ, पर लोकगीत मेरी परंपराओं में है।
पता नहीं लोग ऐसा क्यों करते हैं? मैं और गजेन्द्र किसी की नौकरी नहीं कर रहे थे। हमें जब नया मौका मिला, हमने छोड़ दिया।
नहीं। अंताक्षरी टीवी की दुनिया का सबसे पहला बड़ा और पुराना रिएल्टी शो था। हम चाहते थे कि उसमें कुछ नया हो पर हमेशा चीजें एक जैसी नहीं रहतीं।
सबसे खास तो यही है कि इसमें संगीत की तीनों विधाएं शामिल हैं। यही नहीं यह संगीत के इतिहास और नए आने वाले गायकों की तलाश केवल फिल्मों के लिए नहीं करेगा।
यह सूफी के शायराना और अध्यात्मक अंदाज, लोकगायकी की आत्मा और दोनों के सम्मिश्रण से उपजे फिल्म संगीत की बात भी करेगा। अभी तक के सारे ऐसे शो केवल फिल्म संगीत वाले हैं।मैं आपको युवा नहीं लगता क्या? (हंसते हैं) ऐसी बात नहीं है। एंकर चाहे कोई भी हो बस उसे संगीत की समझ होनी चाहिए। जहाँ तक अंताक्षरी की बात है तो वह ऐसे शोज की जननी है। उसके बाद ही सारेगामा, इंडियन आयडल वगरैह का दौर शुरू हुआ। यदि आप गौर करें तो पाएंगे की इनमें सारे चैनलों पर जितने ऐसे शो हैं, उनमें लगभग सारे गजेन्द्र सिंह के हैं।
कुछ नहीं। बस उनके साथ मेरी जम जाती है। (हंसते हैं)
नहीं। वह पूरी तरह हिंदू परंपराओं और मान्यताओं को मद्देनजर रख कर बनाया गया शो था। मैं आलोचनाओं और मतभेदों के साथ काम करना पसंद नहीं करता।
नहीं, हम उसमें शामिल प्रतियोगियों के विकास को एक गुप्त कैमरे से दिखाते भर थे, हम उनके व्यक्तिगत जीवन को नहीं छेड़ते थे। दरअसल यह मनोरंजन और प्रतिभा ढूंढने का नया प्रयोगिक शो था। मैं चाहता हूँ कि नयी प्रतिभाएं सामने आएं इसीलिए मैंने जी सिने स्टार की खोज में एक एपिसोड की जजिंग भी की।
(हंसते हैं) ऐसी बात नहीं। मैं कम टीवी देखता हूँ। कम से कम अपने शोज तो देख ही लेता हूँ ताकि पता रहे कि क्या गलत किया?
छोड़ा कहाँ? अब समय नहीं मिलता। मैंने अपनी हालिया अंतिम फिल्म `अभय' की थी। जया बच्चन की यह फिल्म बच्चों की बाल विकास फिल्म समिति के साथ बनायी गयी थी। इसके अलावा दो फिल्में `द फकीर ऑफ वेनिस' और `दो दिलों के खेल में' भी जल्दी ही आने वाली हैं।
वीनस का फकीर दो ऐसे भारतीयों की कहानी है, जो 1999 में वीनस गए थे लेकिन उसके बाद उनकी जिंदगी बदल जाती है। निर्देशक आनंद सुरापुर की इस फिल्म में मेरे साथ फरहान अख्तर भी हैं। दूसरी फिल्म में मैं एक ऐसे पंजाबी आदमी की भूमिका में हूँ जिसका विवाह एक दक्षिण भारतीय महिला से हो जाता है।
फिलहाल नहीं। अभी तो बस एंकरिंग में ही व्यस्त हूँ।
बेताब, हम, दामूल, तेजाब, गर्दिश, मिस्टर इंडिया, उत्सव, एक रुका हुआ फैसला और एतराज मेरे कॅरियर की बेहतरीन फिल्में हैं।
हाँ, हर आदमी का एक सपना होता है। यह फिल्म एक मशहूर क्लासिक कृति पर होगी। मैं चाहता हूँ कि इसमें बिग बी और शाहिद कपूर काम करें।
(हंसते हैं) मैं चर्चा की बजाय काम करना पसंद करता हूँ। मेरी अपनी शर्तें हैं, पर वे ऐसी नहीं कि किसी को दुःख पहुँचाएं। आजकल पता नहीं कौन किस बात का क्या अर्थ लगाए? (हंसते हैं)