पुरुषोत्तम क्षर-अक्षर दोनों से ऊपर
पुरुषोत्तम आदि-कारण हैं अर्थात् अपने अंदर निहित वृत्तियों के अभिध्यान एवं तपस्या द्वारा वे ही सृष्टि के यावन्मात्र पदार्थों में परिणत हुए हैं। ऐसा होने का कारण है, उनकी इच्छा। वह इच्छा ही वैधीकरण के पथ द्वारा प्रवाहित होकर सृष्टि के रूप में उद्भिन्न हो उठी है। इसलिए इस संसार में जो कुछ भी होता है, वह दृढ़-इच्छाशक्ति और वैधीकरण के रास्ते से ही होता है। पुरुषोत्तम भी इस नियम से बाहर नहीं हैं। इस दृष्टिकोण से देखा जाये तो साधारण मनुष्यों से उनका कोई पार्थक्य नहीं है। इस तरह प्रति-प्रत्येक मनुष्य ही सच्चिदानंद धन-विग्रह है। ईश्वर ने मनुष्य को अपने ही अनुरूप बनाया है। लेकिन एक अन्य स्वर भी है, जहां मनुष्य और ईश्वर में स्पष्ट अंतर दिखाई पड़ता है और वह है, स्मृतिवाही चेतना। मनुष्य की स्मृतिवाही चेतना अल्प है, सीमित है, लेकिन उनकी चेतना अखंड है। आदि, मध्य और अंत यानी भूत, वर्तमान और भविष्य तीनों काल के ज्ञाता हैं। इसलिए वे सब कुछ को जानते हैं। विश्वात्मा की पूर्ण चेतना उनके अंदर सदा विराजमान रहती है, जिसके आलोक में वे चलते रहते हैं। उस परम उत्स के साथ सक्रिय भाव से वे निरंतर योग-युक्त रहते हैं, लेकिन साधारण लोगों के साथ ऐसी बातें नहीं हैं। इसलिए भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि बहुनि में व्यतीतानि जन्मानि तब चार्जुन
तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परंतया।। अर्थात् हे अर्जुन, मेरे और तुम्हारे बहुत से जन्म हो चुके हैं, परंतु हे परंपत! मैं इन सबको जानता हूं, किन्तु तुम उन सबको नहीं जानते। यही, सब कुछ को जानना है- स्मृतिवाही चेतना।। इसके बावजूद भी वे सभी मानवीय सीमाओं को मानते हैं। नराकार कृष्ण, नित्य अपने दैनिक कार्यों को नहीं करें, भोजन नहीं करें, मां-बाप, स्त्री-पुत्र को प्यार नहीं करें, सुख-दुःख का बोध नहीं करें, ऐसी बात नहीं है। सहज रूप में वे मनुष्य हैं। अत वे यदि अपने सभी मानवोचित कार्यों का सम्पादन नहीं करें, तो ऐसी अवस्था में आदमी उनका अनुसरण नहीं कर सकता। अगर अनुसरण करता भी है, तो उसे लाभ नहीं मिलेगा। सृष्टि संभूत जीवों का क्षर-भाव उनके अंदर पूर्ण मात्रा में विद्यमान रहता है। किसी अलौकिक बात का वे सहारा नहीं लेते। साधारण लोगों की तरह रोग-शोक, आधि-व्याधि, मृत्यु आदि सभी मानवीय सीमाओं की मर्यादा को वे मानते हैं, किन्तु उनका यह मानवोचित रूप जितना सत्य है, उनका भूत-महेश्वरत्व एवं अक्षरत्व भी उतना ही सत्य है, शाश्वत है। वह परम-चेतना उनके अंदर सहज-भाव से सतत् विद्यमान रहती है, जो उन्हें प्रतिक्षण परिचालित करती रहती है। यह परम-चेतना निश्वास-प्रश्वास की तरह उनमें सहज और सलील रहती है। इसलिए सब कुछ को लेकर भी वे सहज हैं, स्वभाव सुंदर हैं और सर्वाकर्षक हैं। वे प्रेम के भूखे होते हैं और वे ही मनुष्यों की मुक्ति के राजपथ हैं। इसलिए उन्हें छोड़कर इस पृथ्वी पर ईश्वर प्राप्ति का दूसरा कोई विकल्प नहीं है। अत अधुनातन युगपुरुषोत्तम ही हैं - मनुष्यों की उपासना की परमवेदी उनकी उपासना का अर्थ होता है- पूर्ववर्ती सभी पुरुषोत्तमों की उपासना। अगर ऐसा हो कि पुरुषोत्तम मूर्त्त व्यक्तित्व में उपलब्ध न हो तो तदनुगामी आचारवान ऋत्विक के द्वारा उन्हीं के पवर्तित मंत्र से दीक्षित होकर उनके आदेश - निर्देशों को मानते हुए, उन्हीं की उपासना करने का विधान है। ऐसा करना ही मनुष्य के लिये एकमात्र कल्याण का पथ है। ध्यान रखना होगा कि सभी अवस्थाओं में एकमात्र पुरुषोत्तम ही गंतव्य और ग्रहणीय होते हैं। |
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