Indian Parliment

परमाणु करार को लेकर चल रही राजनीतिक जंग लोकसभा में पहुँच गयी है और आज दो दिवसीय विशेष सत्र के पहले दिन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने विश्वास-मत पेश किया। सिंह ने कहा कि उनकी सरकार ने हर फैसला राष्ट्रहित को ध्यान में रखकर किया। उधर, इस्तीफा देने के माकपा के निर्देश की परवाह किये बिना लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने सुबह सदन की कार्यवाही का संचालन शुरू किया। प्रधानमंत्री ने एक पंक्ति का विश्वास प्रस्ताव पेश किया कि `यह सदन मंत्रिपरिषद में विश्वास व्यक्त करता है।'

विश्वास-मत पर चर्चा के लिए 12 घंटे का समय निर्धारित किया गया है और इस पर प्रधानमंत्री के जवाब के बाद कल शाम छह बजे मत विभाजन होने की उम्मीद है। संसद में प्रवेश करने से पहले प्रधानमंत्री ने विश्वास जताया कि संप्रग बहुमत साबित कर लेगी। उन्होंने सदन में भी संक्षिप्त भाषण दिया और इस दौरान भारत-अमेरिकी परमाणु करार के गुण दोषों की कोई चर्चा नहीं की।

इसी करार लो लेकर वाम दलों ने संप्रग सरकार से समर्थन खींच लिया था। इस मौके पर प्रधानमंत्री ने गुरु गोविन्द सिंह की वाणी का उल्लेख किया, जिसका आशय था कि वह मैदान छोड़कर भागने की बजाय लड़ते हुए शहीद होना बेहतर समझेंगे।लोकसभा में संप्रग सरकार के विश्वास प्रस्ताव पर बहस के दौरान पक्ष और विपक्ष के तीरों से जमकर अंगारे बरसते रहे और इस दौरान तृणमूल कांग्रेस और राजग के संभवत: 10 अन्य सांसदों के मतदान में भाग न लेने की अटकलों ने सत्ता पक्ष को राहत पहुँचाई। 541 सदस्यीय लोकसभा में मौजूद संप्रग सदस्यों के हावभाव में विश्वास और जीत का उत्साह झलकने लगा है। विदेश-मंत्री प्रणव मुखर्जी ने दावा किया है कि कांग्रेस नेतृत्व वाले गठबंधन के पास 276 सांसदों का समर्थन है, जो साफ तौर पर बहुमत को पार कर रहा है। आज सवेरे सोमनाथ चटर्जी ने लोकसभा स्पीकर के रूप में अपने संवैधानिक दायित्व का निर्वाह किया। हालाँकि माकपा ने कल कहा था कि सोमनाथ चटर्जी को विश्वास प्रस्ताव पेश किये जाने से पहले अपने पद से इस्तीफा दे देना चाहिए। तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी ने स्पष्ट कर दिया है कि वह कल होने वाले मतदान में भाग नहीं लेंगी। ऐसे में यह अफवाह भी जोरों पर है कि भाजपा, शिवसेना, जद (यू) और बीजद के करीब 10 सांसद भी मतदान में भाग नहीं लेंगे।

एक पंक्ति का विश्वास प्रस्ताव जिस पर लिखा था, `यह सदन मंत्रिपरिषद के प्रति अपना विश्वास व्यक्त करता है।' को पेश करते हुए 75 वर्षीय प्रधानमंत्री ने कहा कि उनकी सरकार ने पिछले चार वर्ष में जितने भी फैसले किये वह हमारी जनता और हमारे देश के हित में थे।

सिंह पर पहला हमला बोलते हुए विपक्ष के नेता लाल कृष्ण आडवाणी ने कहा कि मौजूदा राजनीतिक संकट के लिए प्रधानमंत्री `अकेले' जिम्मेदार हैं। उन्होंने कहा कि भारत- अमेरिका परमाणु करार दो व्यक्तियों के बीच का समझौता है, जिसमें भारत की भूमिका `जूनियर भागीदार' की और `कमतर' रही।

आडवाणी ने कहा, `संप्रग की हालत आईसीयू के मरीज जैसी है। सब यही सवाल पूछ रहे हैं कि यह मरीज बचेगा या नहीं।' आडवाणी ने टिप्पणी की कि मनमोहन सिंह ने वर्ष 1998 में पोखरन द्वितीय परमाणु परीक्षणों का विरोध किया था। इस पर मनमोहन ने तल्ख लहजे में जवाब दिया कि उन्होंने विस्फोट के बाद भारत पर लगाए जाने वाले प्रतिबंधों और देश के सामने आने वाली चुनौतियों की बात की थी। आँकड़ों के खेल के रफ्तार पकड़ने के बीच प्रणव मुखर्जी ने अपने सीधे सादे हिसाब में कहा कि संप्रग के पास 237 सांसदों का समर्थन है। इनमें समाजवादी पार्टी के 39 सदस्य और जोड़ दिए जाएँ, तो यह आँकड़ा 276 हो जाता है। लोकसभा की कामकाजी क्षमता इस समय 541 है, इसलिए सत्तारूढ़ गठबंधन के पास स्पष्ट बहुमत है।

भाजपा के नेता विजय कुमार मल्होत्रा ने दावा किया कि संप्रग का विरोध करने वाले समूह एकजुट हैं और सरकार गिराने के लिए चार से पाँच और सांसदों की जरूरत है। शिवसेना के सांसद तुकाराम रेंगे पाटिल पार्टी के संसदीय दल की बैठक में नहीं पहुँचे। इससे इन अटकलों को बल मिला कि वह पार्टी से अलग जा सकते हैं, जिसके लोकसभा में 12 सांसद हैं। लोकसभा में माहौल उस समय गर्म हो गया, जब एक मौके पर बसपा और सपा के सांसदों में तकरार हुई।

परमाणु करार के मसले पर सरकार की तरफ से वाम दलों को मनाने की असफल कोशिश करने वाले मुखर्जी ने अपने भावुक संबोधन में सरकार के पूर्व समर्थक दलों से कहा, `अपने दिल पर हाथ रखिए और पूछिए कि क्या यह वाकई सरकार गिराने लायक मसला है। हाल के महीनों में संप्रग और वाम दलों के बीच आई कड़वाहट को एक तरफ करते हुए प्रधानमंत्री ने वयोवृद्ध मार्क्सवादी नेताओं ज्योति बसु और हरिकिशन सुरजीत की सराहना की और कहा कि उन्होंने अपनी दूरदर्शिता और कुशल नेतृत्व से साझा सरकार के गठन में योगदान दिया।

सिंह ने प्रकाश करात के बारे में कुछ नहीं कहा, जिन के साथ परमाणु करार पर प्रधानमंत्री के गहरे मतभेद रहे हैं। विश्वास प्रस्ताव पेश करते हुए सिंह ने अपने संक्षिप्त संबोधन में बसु और सुरजीत को साझा सरकार का रचनाकार बताया।