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वृद्ध दम्पत्तियों पर कहर
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By विनय वीर
प्रकाशित 07/22/2008
 
यदि सामाजिक परम्पराएं एवं आदर्श अपनी ही जड़ें खोदने लगें, तो समाज के पास रह ही क्या जाएगा? पत्तों का अस्तित्व तब तक ही हरा-भरा है, जब तक वे वृक्ष की डालियों से जुड़े रहते हैं, शाख से टूटते ही उनके अस्तित्व पर प्रशनचिह्न लग जाता है।

वृद्ध दम्पत्तियों पर कहर
यदि सामाजिक परम्पराएं एवं आदर्श अपनी ही जड़ें खोदने लगें, तो समाज के पास रह ही क्या जाएगा? पत्तों का अस्तित्व तब तक ही हरा-भरा है, जब तक वे वृक्ष की डालियों से जुड़े रहते हैं, शाख से टूटते ही उनके अस्तित्व पर प्रशनचिह्न लग जाता है। आदिकाल से लेकर वर्तमान तक सभी समाज सुधारक बुद्धिजीवी इस विषय पर एकमत हैं।  

पारिवारिक विशिष्टताओं में आज भी संयुक्त परिवार के महत्व को नकारा नहीं जा सकता फिर भी आधुनिक स्वच्छंदता की चाह में हो रहे पारिवारिक विखंडन एवं शहर की एकांगी आबोहवा ने आज व्यक्ति को ऐसे दोराहे पर ला खड़ा किया है, जहाँ उसकी सुरक्षा-व्यवस्था पर ही प्रशनचिह्न लगने लगे हैं।  

कौन नहीं चाहता कि वह भौतिक सुख-सुविधाओं से सम्पन्न हो। समाज में धन के बढ़ते प्रभाव के कारण जनमानस देह के वास्तविक सुख को भूलकर मात्र धनार्जन को ही जीवन का मुख्य उद्देश्य बना बैठा है। अधिकाधिक धन की प्राप्ति के लिए पारिवारिक आत्मीय रिश्ते उसके लिए बेमानी हो चुके हैं। यदि ऐसा न होता तो व्यक्ति अपने दाम्पत्य जीवन को दांव पर लगाकर मात्र धन के लिए भटकने हेतु विवश न होता। अन्तर्राष्ट्रीय सेवा संस्थानों में विदेश यात्राएं करने वाले तथा विदेशों में बसकर अपने माता-पिता को सेवा सुख न देने वाली सन्तानें यह भूलने के लिए विवश न होतीं कि जिन माता-पिताओं ने अपनी त्यागमयी साधना की है, उस त्यागमयी साधना के बदले वे उन्हें एकाकीपन और असुरक्षा सौंप रहे हैं।  

देश की राजधानी में एकाकी परिवारों एवं बुजुर्ग दम्पत्तियों की हत्याएं क्या यह सिद्ध नहीं करतीं कि ये अधिकांश घटनाएं अपनी जड़ों से कटने के कारण हो रही हैं। व्यक्ति ने अपने आत्मीय संबंध धन के सम्मुख गिरवीं रख दिए हैं। अपने ही परिवार में ऊँच-नीच का भाव रख कर व्यक्ति अपनों से अलग हो रहा है, वह अपनों को छोड़ कर गैरों को अपनाने का प्रयास करता है, बदले में अपनी मृत्यु का आलिंगन करने हेतु विवश हो जाता है। देश के एकाकी वृद्धों पर मंडराता मौत का खतरा उस घिनौने सच को उजागर करता है, जो सामाजिक परम्पराओं और आदर्शों के टूटने से उपजा है।  

निसंदेह सन्तान होने पर भी सन्तान सुख से वंचित बुजुर्ग दम्पत्तियों की वर्तमान दशा अधिकांशत दयनीय है। भौतिकता के अंधे युग ने उन्हें भय एवं असुरक्षा के वातावरण में जीवन-यापन हेतु विवश कर दिया है। पुलिस एवं अन्य सुरक्षा बल इस सामाजिक समस्या के निवारण में कितने कारगर होंगे, कहा नहीं जा सकता। समय आ गया है कि जनमानस अपनी जड़ों से जुड़े, मानवीय सरोकारों एवं आत्मीय रिश्तों से उसका नाता हो, तभी जनमानस स्वस्थ, सामाजिक परिवेश में रह सकता है।