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खाड़ी में बिछ गई है युद्ध और शांति की नई बिसात
हालांकि ईरान बार-बार यह दोहराता आ रहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम हथियारों के लिए नहीं बल्कि अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए है, लेकिन पश्चिमी देश उसकी इस बात को मानने के लिए तैयार नहीं हैं। ईरान से सबसे ज्यादा खतरा इज़राइल महसूस करता है। इसलिए इस वर्ष जून में इज़राइल ने सैन्य युद्धाभ्यास आयोजित किए, यह दर्शाने के लिए कि उसके पास ईरान के परमाणु प्रतिष्ठानों पर हमला करने की क्षमता है और वह कभी भी ऐसा कर सकता है। गौरतलब है कि कुछ वर्ष पहले इज़राइल ने इराक के परमाणु सयंत्र पर हमला करके उसे नष्ट कर दिया था। लेकिन अब स्थितियां अलग हैं और ईरान की ताकत उस समय के इराक से कहीं अधिक है।
इज़राइल की अप्रत्यक्ष धमकी के जवाब में ईरान ने जुलाई के दूसरे सप्ताह में शाहाब-3 मिसाइल का परीक्षण खाड़ी में हॉर्मूज़ के निकट किया। यह मिसाइल 2000 किलोमीटर तक मार कर सकती है और एक टन वारहेड कैरी कर सकती है। इस मिसाइल की रेंज से स्पष्ट हो जाता है कि ईरान अब इज़राइल, खाड़ी में अमेरिकी बेस और यूरोप के कुछ हिस्सों तक मार कर सकता है। शाहाब-3 मिसाइल को ईरान ने नवंबर, 2006 में भी क्लस्टर बम वारहेड के साथ टेस्ट फायर किया था। हाल की एक्सरसाइज के दौरान ईरान ने 9 उच्च स्तरीय मिसाइल टेस्ट फायर किए जिनमें जलज़ाल और फतह मिसाइलें भी थीं जिनकी मारक क्षमता 170 से 400 किलोमीटर तक की है। ईरान ने यह सैन्य एक्सरसाइज इज़राइल की उस एक्सरसाइज के बाद आयोजित किया जिसमें इजराइल ने 100 से अधिक एफ-16 व एफ-15 फाइटर जेट 1440 किलोमीटर की दूरी तक उड़ाए थे। ध्यान रहे कि इज़राइल और ईरान के नतांज परमाणु प्लांट के बीच लगभग 1440 किलोमीटर का ही फासला है। दूसरे शब्दों में अपनी इस एक्सरसाइज से इज़राइल ने स्पष्ट धमकी दी थी कि वह ईरान के परमाणु प्लांट पर सैन्य हमला बोल सकता है। इसके जवाब में ईरान ने भी प्रदर्शित किया कि वह खाड़ी में न सिर्फ हर किस्म की गतिविधि पर विराम लगा देगा बल्कि उसके मिसाइल इज़राइल और खाड़ी में अमेरिकी ठिकानों तक वार करने में सक्षम हैं। इन दोनों बातों से लगता है कि खाड़ी में अब किसी भी समय युद्ध हो सकता है, अगर संयुक्त राष्ट्र और पश्चिमी देशों ने हस्तक्षेप करके इज़राइल को न रोका। बहरहाल, अगर युद्ध की स्थिति बनती है तो कच्चे तेल के दाम जो लगभग 148 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गए हैं, वह आसमान छूने लगेंगे और महंगाई, जिसे थामना अब भी मुश्किल हो रहा है, और तेजी से बढ़ने लगेगी। हालांकि अंतर्राष्ट्रीय कोशिशें जारी हैं कि इज़राइल को कोई भी उल्टी हरकत न करने दी जाए, लेकिन इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि इज़राइली सरकार अमेरिका पर दबाव बना रही है कि वह ईरान पर हमला बोले। इन्हीं तथ्यों को मद्देनजर रखते हुए इजराइल की सैन्य एक्सरसाइज के बाद अंतर्राष्ट्रीय एटॉमिक एनर्जी एजेंसी के प्रमुख मुहम्मद अलबरदायी ने कहा था कि अगर ईरान पर सैन्य हमला किया गया तो वे अपने पद से इस्तीफा दे देंगे। दूसरी ओर ईरान के धर्मगुरु अली खेमैनी ने कहा है, `अगर अमेरिका या इजराइल ने ईरान पर हमला करने की बेवकूफी की तो ईरान का पहला निशाना खाड़ी में मौजूद इजराइल व अमेरिका के जहाज होंगे जिन्हें जला दिया जाएगा। इसके अलावा स्ट्रेट ऑफ हर्मूज से किसी भी जहाज को आने-जाने नहीं दिया जाएगा।' गौरतलब है कि खाड़ी का अधिकतर तेल इसी चैनल से निर्यात किया जाता है। दरअसल, खाड़ी में निरंतर तनाव बढ़ता चला जा रहा है। बहरीन की मदद से एंग्लो-अमेरिकन अभ्यास भी खाड़ी में किए जा रहे हैं, इस आशंका को मद्देनजर रखते हुए कि अगर ईरान ने खाड़ी के तेल प्रतिष्ठानों पर हमला किया तो उनकी किस तरह से सुरक्षा की जाए। उधर खाड़ी में तनाव कम करने के लिए ईरान के अंदर भी नए परिवर्तन किए जा रहे हैं। हालांकि ईरान के राष्ट्रपति चुनाव लगभग 1 साल बाद होंगे लेकिन धर्मगुरु अयातुल्ला अली खेमैनी ने विदेश नीति को राष्ट्रपति महमूद अमदीनेजाद से लेकर अपने कब्जे में ले ली है। ऐसा ईरान के प्रभावशाली राजनीतिज्ञ अली अकबर विलायती का कहना है, जो लगभग 17 वर्ष तक ईरान के विदेश मंत्री रहे और अब अली खुमैनी के राजनयिक सलाहकार हैं। विलायती का कहना है कि अली खेमैनी अब स्वयं परमाणु कार्यक्रम पर पश्चिमी देशों से वार्ता की निगरानी करेंगे ताकि ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर कोई समझौते की राह निकल सके। इसका अर्थ यह हुआ कि अब महमूद अहमदीनेजाद को इस जिम्मेदारी से हटा दिया गया है। हालांकि अली खेमैनी द्वारा विदेश नीति की जिम्मेदारी संभालने का फैसला पहली नजर में आश्चर्यजनक लगता है लेकिन इसके कई संभावित कारण हैं। सबसे पहली बात तो यह है कि ईरान अमेरिका के नए राष्ट्रपति से वार्ता करने के लिए जमीन तैयार कर रहा है ताकि सभी मुख्य समस्याओं पर पिछली बातों को भुलाकर नई शुरूआत की जा सके। इस तरह तेहरान को अपने परमाणु कार्यक्रम के लिए समय मिल जाएगा और साथ ही इजराइल से तनाव भी कम हो जाएगा। गौरतलब है कि अली खेमैनी ने हाल ही में कहा था कि अंतर्राष्ट्रीय शांति का आधार सभी देशों की सीमाओं और प्रभुसत्ता को सम्मान देने पर निर्भर है। यह स्पष्ट संकेत है कि अली खेमैनी अब `इजराइल को पृथ्वी के नक्शे पर से हटाने' के इच्छुक नहीं हैं। वे मानते हैं कि मध्यपूर्व एशिया में मुख्य देशों का राजनीतिक भविष्य लोकतांत्रिक चुनावों के आधार पर तय होना चाहिए और जिनके नतीजों का सम्मान मुस्लिम, यहूदी और ईसाई सभी करें व सभी समुदाय बतौर स्वतंत्र नागरिक के इन चुनावों में हिस्सा लें। दूसरे शब्दों में अब अली खेमैनी की सोच यह है कि अगर फिलिस्तीनी न राष्ट्र के सिद्धांत पर शांति समझौते के पक्ष में मतदान करें तो ईरान फिलिस्तीनियों का साथ देगा और इजराइल को मान्यता प्रदान कर देगा। अली खेमैनी द्वारा विदेश नीति को अपने हाथ में लेने की दूसरी वजह यह है कि उन्होंने अगले साल होने वाले राष्ट्रपति चुनावों के लिए अपनी तैयारी शुरू कर दी है। अहमदीनेजाद से विदेश नीति लेकर अली खेमैनी ने उनकी ताकत को काफी हद तक कम कर दिया है जिसका अर्थ यह है कि अब अली खेमैनी नहीं चाहते कि अहमदीनेजाद अगले चुनावों के बाद राष्ट्रपति पद पर बने रहें। यह तो इस लेख से अलग की बात है कि ईरान में अगला राष्ट्रपति कौन होगा और वह अहमदीनेजाद की नीतियों को आगे बढ़ाएगा या नहीं? लेकिन फिलहाल अली खेमैनी की चाल से इतना तय लगता है कि खाड़ी में तनाव के बावजूद अगर हमेशा के लिए नहीं तो कुछ समय के लिए अवश्य युद्ध टल जाएगा। दरअसल, असल बात यह है कि अपने परमाणु कार्यक्रम को जारी रखने के लिए और उसे एक निश्चित मुकाम तक पहुंचाने के लिए ईरान को समय भी चाहिए और शांति भी। अली खेमैनी उसे यही दिलाना चाहते हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या इजराइल और अमेरिका ईरान को यह मोहलत देंगे? इसी प्रश्न के जवाब में खाड़ी का भविष्य व खाड़ी में शांति टिकी हुई है। बुकमार्क किजिए
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