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डील ही डील
यह पंक्तियां लिखे जाने तक स्पष्ट नहीं हो पाया था कि विश्वासमत का ऊँट किस करवट बैठेगा लेकिन इसके पहले की अफरा-तफरी ने जो नज़ारा दिखाया वह अद्भुत था। प्रस्तुत है, डील पर एक नज़रिया- डील ही डील, जहां देखो, जहां सुनो, बस डील ही डील। सरकार ने इधर अमेरिका से डील करने के लिए तरह-तरह की डीलों का रास्ता खोल दिया है। पर यह वैसा बिल्कुल नहीं है, जैसे एक झूठ को छिपाने के लिए सौ झूठ बोलने पड़ते हैं। हालांकि एक डील ने कितनी ही नयी डीलों को जन्म दिया है। अब तरह-तरह की डीलें हो रही हैं। कांग्रेस की समाजवादी पार्टी के साथ डील। समाजवादी पार्टी के साथ लालूजी की डील। समाजवादी पार्टी के बागी सांसदों की मायावती के साथ डील। मायावती की वामपंथियों के साथ डील। भाजपा की अमरसिंह के साथ डील। और अमरसिंह की किस-किस के साथ डील है, पता नहीं। समाजवादी पार्टी की तीसरे मोर्चे के साथ डील। इन सबके बीच अजित सिंह और देवगौड़ा की मायावती के साथ डील। इतनी डीलें हैं कि ठीक से डील करना भी मुश्किल है।
इनमें कुछ डील सिरे चढ़ीं और कुछ विफल हो गईं। जैसे समाजवादी पार्टी की तीसरे मोर्चे के साथ डील सिरे नहीं चढ़ पायी। चौटाला टाइप जो लोग एकदम फुर्सत में थे, न सरकार, न कोई सांसद। वे तीसरे मोर्चे से बड़ी उम्मीदें पाले बैठे थे। कुछ इसी अंदाज में कि हमारा भी वक्त आएगा। अबकी बार न कांग्रेस, न भाजपा, तीसरे मोर्चे की सरकार बनेगी। हालांकि तीसरे मोर्चे के साथ अपशकुन तो तभी हो गया था, जब मोर्चा बनते ही जयललिता नाराज़ होकर अलग हो गयी थीं। क्योंकि अमर सिंह ने उनके साथ बात नहीं की थी। हालांकि अमर सिंह तो सबसे बात करते हैं। राजनीति में हैं तो राजनीतिज्ञों से तो बात करते ही होंगे। पर कारपोरेट सेठों से भी करते हैं, बॉलीवुड के सितारों से करते हैं, मीडिया से भी खूब बात करते हैं। पर उन्हीं पर जयललिता ने बात न करने का आरोप लगा दिया और अलग हो गयीं। अब सुना है चौटाला और चंद्रबाबू नायुडू भी मुलायम-अमरसिंह से नाराज हैं। क्योंकि उन्होंने कांग्रेस से डील कर ली। जबकि उनके मुताबिक वे कांग्रेस से डील नहीं कर सकते। अलबत्ता भाजपा से कर सकते हैं। इसीलिए जब मुलायम-अमर सिंह ने उनसे डील करने की कोशिश की तो वह हो नहीं पायी। लेकिन इस तरह फिलहाल तो तीसरे मोर्चे का सुंदर सपना चल रहा है। अजित सिंह और देवगौड़ा के साथ कांग्रेस की डील सिरे नहीं चढ़ पाई। भाजपा के साथ समाजवादी पार्टी की डील भी सिरे नहीं चढ़ पायी। अमर सिंह ने बताया कि जसवंत सिंह यूपीए सरकार को गिराने के लिए उनसे डील करने आए थे। वे एक साल पहले भी ऐसी ही डील करने आए थे। बोले-राष्ट्रपति के लिए शेखावतजी को वोट दो और प्रधानमंत्री बनो। अब पता चल रहा है कि जयललिता क्यों अलग हुयी थीं। वैसे जसवंत सिंह के गिराए राजस्थान की वसुंधरा सरकार तो गिर नहीं रही, सोनियाजी की अर्थात मनमोहन सिंह की सरकार कैसे गिर जाएगी। पता नहीं भाजपा को इतनी जल्दी क्या है। पर भाजपा भी क्या करे? आडवाणीजी आखिर कब तक वेट करेंगे? जो भी हो, मुलायम-अमर सिंह की कांग्रेस के साथ पक्की डील हो गयी। वे कह रहे हैं कि वे डील के लिए सरकार के साथ हैं। हालांकि जब कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बीच डील के लिए डील हो रही थी, तब अमर सिंह अमेरिका में थे। लोगों का मानना है कि डील के लिए वही सही जगह है। उनके देश आते ही डील हो गयी। इस डील के लिए उन्होंने वामपंथियों से अपनी दोस्ती भी तोड़ दी। हालांकि वे वामपंथियों को अपना पक्का दोस्त मानते रहे हैं, पर कहते हैं, जब-जब डील का मसला आता है, वे यह दोस्ती तोड़ देते हैं। तेरह महीने वाली अटलजी की सरकार जब गिरी थी और सोनिया जी ने घोषणा कर दी थी कि सरकार बनाने के लिए उनके पास नंबर हैं, तब भी उन्होंने वामपंथियों से दोस्ती तोड़ दी थी। क्योंकि वामपंथी सोनिया जी की सरकार बनवाना चाहते थे और मुलायम सिंह-अमर सिंह नहीं बनवाना चाहते थे। वयोवृद्ध वामपंथी नेता हरकिशन सिंह सुरजीत भी तब मुलायम सिंह को नहीं मना पाए थे। फिर उन्होंने डॉ. कलाम को राष्ट्रपति बनाने के लिए एक बार फिर वामपंथियों से दोस्ती तोड़ी। उनके साथ लोकमोर्चा उन्होंने कुछ महीने पहले ही बनाया था, पर तोड़ दिया। तब भी काफी कटुता आयी थी। और अब एक बार फिर उन्होंने वामपंथियों से दोस्ती तोड़ दी है। उन्होंने तीसरे मोर्चे से भी दोस्ती तोड़ दी। बल्कि तीसरा मोर्चा तो घर ही था। घर ही तोड़ दिया। लेकिन ऐसा नहीं है कि उन्होंने दोस्ती तोड़ी, मोर्चा तोड़ा। उन्होंने कांग्रेस के साथ अपनी दुश्मनी भी छोड़ी है। उस अपमान को भी भुलाया है, जो दस जनपथ में आयोजित डिनर में उन्हें झेलना पड़ा था। यह पता नहीं कि यह दुश्मनी कितने दिन के लिए छोड़ी है। राजनीति की पुरानी कहावत है कि यहाँ न कोई स्थायी दोस्त होता है और न स्थायी दुश्मन। इस सबके बावजूद डील खूब चली। कोई कह रहा है कि मुलायम-अमर सिंह की जोड़ी पेट्रोलियम मंत्री मुरली देवड़ा और पी. चिदम्बरम को हटवाना चाहती है। कोई कह रहा है कि कितनी तो मिनिस्ट्रियां मांग रहे हैं। सेठों के लिए सहूलियतें अलग हैं। वामपंथियों ने तो चार साल सरकार चलवायी, मुलायम-अमर सिंह की जोड़ी चार महीने भी चलवा दे तो उपलब्धि होगी। पर इस डील में पंगा उस डील ने डाल दिया है, जो समाजवादी पार्टी के कोई दर्जनभर सांसद मायावती के साथ करने में लगे हैं। अगर वह डील सिरे चढ़ गयी तो क्या होगा? उसके आगे तो कोई डील काम नहीं करेगी। न अमेरिका के साथ सरकार की डील और न कांग्रेस के साथ मुलायम सिंह- अमर सिंह की डील। हां, फिर कांग्रेस की शिवसेना या अकालियों के साथ डील हो जाए तो बात अलग है। बुकमार्क किजिए
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