कल अचानक गुनगुनाते चीड़वन जलने लगे  
और उसके पाँव से लिपटी नदी बहती रही!  
 
है नदी के पास भी अपनी सुलगती पीर है
दोपहर की धूप में जलते पहाड़ों पर,
आग झरते जंगलों की गोद में तकदीर है  
 
कौन सुनता है किसी का दर्द इस माहौल में
पर नदी कल-कल विकल अपनी कथा कहती रही!  
 
धूप के अपने कथानक भी यहाँ पर हैं बड़े
क्या करें सब विवश होकर थरथराते बाँचते
ये सुहाने वृक्ष ऊँचे पर्वतों पर जो खड़े  
 
क्षीण-काया, अग्निवीणा पर छिड़े संगीत का
भीड़ थर-थर काँपती सहती रही!  
और फिर भी यह नदी बहती रही।  
 
कल अचानक गुनगुनाते चीड़वन जलने लगे
और उनके पाँव से लिपटी नदी बहती रही।  
-    शतदल
अशोक नगर, कानपुर