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ग़ज़ल - राहत हुसैन राहत
बराबरी का ज़माना है, तुम न साथ चलो मेरा लिबास पुराना है, तुम न साथ चलो मेरे खिलाफ ज़माना है, तुम न साथ चलो खबर नहीं कहाँ जाना है, तुम न साथ चलो कहेगा कौन भला फिर मुझे खुदा हाफिज़ तुम्हें ये फर्ज़ निभाना है, तुम न साथ चलो बिछड़ के मिलने में आता है लुत्फ मिलने का अगर ये लुत्फ उठाना है, तुम न साथ चलो तुम्हें है आरज़ू म़ांजिल की और `राहत' को तलाशे राह में जाना है, तुम न साथ चलो - राहत हुसैन राहत
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