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ग़ज़ल - राहत हुसैन राहत
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By विनय वीर
प्रकाशित 07/22/2008
 
बराबरी का ज़माना है, तुम न साथ चलो
मेरा लिबास पुराना है, तुम न साथ चलो

ग़ज़ल - राहत हुसैन राहत
बराबरी का ज़माना है, तुम न साथ चलो
मेरा लिबास पुराना है, तुम न साथ चलो

मेरे खिलाफ ज़माना है, तुम न साथ चलो
खबर नहीं कहाँ जाना है, तुम न साथ चलो

कहेगा कौन भला फिर मुझे खुदा हाफिज़  
तुम्हें ये फर्ज़ निभाना है, तुम न साथ चलो  
 
बिछड़ के मिलने में आता है लुत्फ मिलने का
अगर ये लुत्फ उठाना है, तुम न साथ चलो  
 
तुम्हें है आरज़ू म़ांजिल की और `राहत' को
तलाशे राह में जाना है, तुम न साथ चलो  
- राहत हुसैन राहत