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दर्द मुँह खोले - दिवाकर पाण्डेय
पहले,
दीवारें भी बोलती थीं, बातें करती थीं, तभी तो अब तक ज़िंन्दा हूँ। किस काम की, ऐसी खामोशी - जिसमें घुटन हो, दर्द मुँह खोले, पीड़ाएँ करवटें लें, और, आह-टीसों में - कहा-सुनी हो जाये। खिड़कियों, और - दरवाजों से तो शोर आता है, कान भर जाते हैं, खुद की आवाज भी - नहीं सुनी जाती। ऐसे में - बातचीत कैसी, और, किससे, बस, ओंठ और आँखें - बन्द कर - गुमसुम हो जाने के सिवा - और क्या। - दिवाकर पाण्डेय
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