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ठहर गया जल - हितेश कुमार शर्मा
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By विनय वीर
प्रकाशित 07/22/2008
 
बहते-बहते ठहर गया जल
शान्त हुई जीवन की हलचल

ठहर गया जल - हितेश कुमार शर्मा
बहते-बहते ठहर गया जल
शान्त हुई जीवन की हलचल

सायंकाल नहीं है लेकिन, देखो सूरज डूब गया है
लक्ष्य अभी तक नहीं मिला पर, जीवन से मन ऊब गया है
आँसू नहीं मगर आँखों से, बाहर निकल गया है काजल
बहते-बहते ठहर गया जल।

षड़यंत्रों में उलझ गया सच, झूठ नाचता है सर चढ़कर
आरक्षण खा गया योग्यता, हुआ मुआ मन पोथी पढ़कर
निष्ठा बदल गयी विष्ठा में, हुई प्रदूषित गंगा निर्मल
बहते-बहते ठहर गया जल।  
 
आज आचरण और आवरण, हर प्राणी का बदल गया है
पुत्री-पिता, बहन-भाई के, रिश्तों में हो खलल गया है
सूपनखाएँ घूम रही हैं, नग्न-उधाड़े, निज वक्षस्थल
बहते-बहते ठहर गया जल।  
 
मर्यादाएँ रामराज की द्वापर युग की, लुप्त हो गईं
नदियों का जल सूख गया है, गंगा जमना सुप्त हो गईं
मन्दिर सूने पड़े हुए हैं, शाम रही है मदिरा में ढल
बहते-बहते ठहर गया जल।  
 
चोर, लुटेरे, अपहर्ता, आतंकवादियों का सुराज है
चारों ओर निरंकुशता है, अस्त-व्यस्त सारा समाज है
आशंका में घिरा हुआ है, थकित, चकित अन्तर्मन विह्वल  
बहते-बहते ठहर गया जल।  
- हितेश कुमार शर्मा  
बिजनौर, उ.प्र.