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बाप - डॉ. वेणुगोपाल अग्रवाल
पत्थरों के जंगल में बेटा, सोच रहा हरियाली बाप कुत्ता सोता है घर में, बाहर करता रखवाली बाप बिके खेत पढ़ाई में सारे, गँवाये गहने इकलौते की शादी में टूटे-जर्जर घर में बाकी बचा है, फूटा लोटा, थाली, बाप वो हरियाली वो महकारे, अब वो मधुर गान कहाँ पंछी उड़ गया परदेस को, अब है सूखी डाली बाप जब से बुढ़िया स्वर्ग सिधारी, तब से तो ये हाल हुआ पा जाता है रुखा-सूखा, होली और दीवाली बाप जिसको गढ़ने में गुज़ारा, जीवन सारा अनगढ़ यूँ ही घर के मालिक से देखो, बन पैठा है माली बाप अनपढ़, जाहिल देहाती को, बाप कहे तो शर्म लगे यारों की महफिल में बेटा, ले आया है जाली बाप धज्जी-धज्जी बिखरे सपने, कतरा-कतरा देह गई जीवन की अन्तिम सीढ़ी पर वेणु, बैठा खाली-खाली बाप - डॉ. वेणुगोपाल अग्रवाल
रामकोट बुकमार्क किजिए
पाठकों के भावभाव #1 (व्यक्त करने वाले सावन पुनिया)
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आप सही है मेरे दोस्त । हर व्यक्ति को अपने माँ बाप की उमिदो को समझना चाहिए ।
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