भारत की सरकारी संस्थाएं तथा गणमान्य जनप्रतिनिधि मानें या न मानें, भारतीय नागरिकों की भुखमरी के दुःखद समाचार रह-रह कर समाचार माध्यमों में आते ही रहते हैं। ये समाचार इतनी बारीकी से दिए जाते हैं कि इन पर अविश्वास नहीं किया जा सकता। यदि ये सत्य पर आधारित हैं तो हम सभी भारतीय नागरिकों को लज्जा से सिर झुका लेना चाहिए, यह सोचकर कि स्वतंत्रता प्राप्ति के छह दशकों के प्रयत्न से भी हम इस स्थिति से अपने को उबार नहीं पाए हैं।  

इस विषय का नवीनतम समाचार मलयालम के एक प्रमुख समाचार-पत्र के प्रथम पृष्ठ पर चित्र सहित प्रकाशित हुआ है। समाचार का सारांश यों है- `भूख से बूढ़ा मरा : मृत्यु को पहचाने बिना बेटा एक हफ्ते उसके समीप बैठा रहा। भोजन व दवा पाए बिना वृद्ध व्यक्ति मर गया। इस वारदात को जाने बिना मंदबुद्धि बेटा करीब एक हफ्ते तक पास ही बैठा रहा। कड़ी दुर्गंध पाकर पड़ोसियों ने जब घर में घुस कर देखा तो पाया कि बूढ़े की लाश में कीड़े रेंग रहे हैं।' पेरूंपारूर (उत्तर केरल) की नालु सेन्ट कॉलोनी में पुंजुकृष्णन (87) का ऐसे ही देहान्त हुआ। बेटे अय्यपनकुट्टी के साथ ही वह रहता था। मंदबुद्धि 56 वर्षीय अय्यपनकुट्टी समझ ही नहीं पाया कि उसका पिता मर गया है। पड़ोसियों का कहना है कि गरीबी और बीमारी के कारण ही यह मृत्यु हुई। बहुत दिनों से पड़ोसियों द्वारा दिये जाते रहे भोजन पर ही बाप-बेटा जीवित थे। अय्यपनकुट्टी का कोई रोजगार नहीं है। केरल दलित फेडरेशन के जिला सचिव पी. ए. शशिधरन का कथन है कि `यद्यपि ये दोनों अनुसूचित वर्ग के हैं तो भी इनको सरकार की ओर से कोई सहायता नहीं मिली है। इनके पास न पहचान-पत्र है न ही कोई राशनकार्ड है।'  

यही समाचार का स्वरूप है। एक पुराना चित्र भी दिया गया है जिसमें एक कुटी के सामने बूढ़ा जमीन पर बैठा है और बेटा बगल में खड़ा है। दोनों अधनंगे हैं।  एक भारतीय नागरिक की इस दयनीय मृत्यु से कुछ कटु सत्यों का खुलासा हो जाता है। एक तो यह कि अनुसूचित वर्गों की सहायता के लिए सरकार जो राशि हर वार्षिक बजट में आवंटित करती है उसका लाभ उन तक नहीं पहुँचता जो समाज के सबसे निचले के तबके में हैं। शायद इसका मुख्य कारण यह हो सकता है कि ये प्राय निरक्षर हैं और इस कारण सरकार अपनी कल्याण योजनाओं का जो विज्ञापन या विवरण समाचार-पत्रों में प्रकाशित करती है वह इन तक पहुँच नहीं पाता। न ही इनके कल्याण के लिए नियुक्त अधिकारी और कर्मचारी इनके पास पहुँचने का कष्ट उठाते हैं। अन्यथा बेटे को बेरोजगार भत्ता और पिता को बुढ़ापे की पेंशन अवश्य मिल जानी चाहिए थी। इतना तो तब भी उन्हें मिल जाना चाहिए था जबकि उनका जन्म अनुसूचित वर्ग में नहीं हुआ होता। यहाँ तो ये अनुसूचित वर्ग के हैं। इसलिए उनको अतिरिक्त सहायता भी मिल जानी चाहिए थी। एक ओर क्रीमीलेयर को भी उच्चशिक्षा और रोजगार में आरक्षण सुनिश्चित करने की मांग और दूसरी ओर भूख मिटाने में भी असमर्थ ये दरिद्रनारायण।  

इस मृत्यु से जो और एक खुलासा होता है वह यह है कि हमारी पंचायत राज व्यवस्था आज भी कारगर ढंग से कार्य संभालने की स्थिति में नहीं है। आशा की जाती है कि हर तिमाही में एक-एक पंचायत वार्ड की ग्रामसभा बुलाई जाए, उस अधिवशन में हर विकास योजना के सफल कार्यान्वयन के लिए आवश्यक चर्चा हो और ऐसे व्यक्तियों का चयन किया जाए, जिनको एक-एक योजना का लाभ पहुँचे। निश्चित रूप से पुंजुकृष्णन और अय्यपन कुट्टी के पंचायत वार्ड की ग्रामसभा का अधिवेशन कई बार हुआ होगा। पर इन दोनों बदनसीबों की हालत पर ग्रामसभा ने क्यों ध्यान नहीं दिया?  

इस खबर का तीसरा खुलासा यह है कि पड़ोसियों को इन दोनों की दुर्दशा का पता था। तभी तो उन्होंने बीच-बीच में उन्हें भोजन पहुँचाया। इस तरह उन्होंने इतने दिनों तक इन्हें जीवित रखा, इसके लिए वे हम सबकी कृतज्ञता के पात्र हैं पर उनका यह भी फर्ज था न कि वे संबंधित सरकारी विभाग के अधिकारियों से मिलकर इनके अधिकार की सुविधाओं व रियायतें इनको दिला देने का भी कष्ट उठाते?