सम्पादकीय


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बिहार की कोसी नदी में आई भयंकर बाढ़ से एक बार फिर यह रेखांकित हुआ है कि बाढ़ का बढ़ता क्षेत्र और इसकी बढ़ती जानलेवा क्षमता को तभी समझा जा सकता है जब बाढ़ नियंत्रण के दो मुख्य उपायों-तटबंधों और बांधों पर खुली बहस हो।

ऐसा लगता है कि कांग्रेसनीत संप्रग सरकार आने वाले चुनाव में रामसेतु का मुद्दा जीवित रखने के पक्ष में नहीं है। इस बाबत उसने जो गलतियाँ कीं और भाजपा सहित अन्य हिन्दू संगठनों ने जिस तरह उसे मुद्दे के तौर पर उछालकर धर्मप्राण हिन्दू जनता के मन में विक्षोभ पैदा किया . .
हमने 29 जुलाई को `मिलाप' के संपादकीय में इस बात का उल्लेख किया था कि यह सोचना-कहना गलत होगा कि एक अरब से ऊपर की जनसंख्या वाला भारत आतंकवादी हौसले के सामने बेबस, निरीह और कमजोर हो गया है। हमने यह भी कहा था कि कमजोरी . .
किसी भी राष्ट्र के विकास में कृषि, खनिज, वन एवं जल संसाधनों की प्रमुख भूमिका रहती है। हमारा देश कृषि प्रधान है परन्तु कृषक यहाँ आत्महत्या करने के लिये मजबूर है। विगत कुछ वर्षों में एक लाख से अधिक किसानों ने आत्महत्या कर ली है।
पिछले साठ वर्षों से असम में हर साल बाढ़ का तांडव होता रहा है। 1950 में हुए भयंकर भूकंप की वजह से ब्रह्मपुत्र एवं उसकी सहायक नदियों के स्वरूप में परिवर्तन आ गया और उसके बाद हर साल बाद तबाही मचने लगी। इस तबाही की रोकथाम के लिए सरकार की तरफ से इतने सालों . .
किसी को भी यह स्वीकार कर लेने में कोई गुरेज़ या हिचक नहीं होनी चाहिए कि एक अरब से ऊपर की आबादी वाला विशाल भारत अब बारूद की ढेर पर बैठा है। बस एक चिन्गारी इसे एक महाविस्फोट के हवाले कर सकती है। आतंकी हौसले दिन-दिन नई बुलंदियाँ छूते, परवान चढ़ते जा रहे हैं . .
आप और हम इसलिए जिन्दा हैं, क्योंकि आतंकवादी हमले के शिकार नहीं हुए। कब, कहाँ और कैसे इन आतंकवादियों द्वारा धमाका किया जाएगा, कहा नहीं जा सकता और इन धमाकों में कितनों की जान जाएगी इसका भी कोई निश्चित आंकड़ा नहीं है। देश में कोई भी स्थान और किसी भी व्यक्ति के प्राण सुरक्षित नहीं हैं।
तिब्बत की आजादी का सवाल फिर उभर कर अंतर्राष्ट्रीय फलक पर आ गया है। तिब्बत के स्वतंत्रता प्रेमी प्रदर्शनकारियों पर चीन का दमनकारी रवैया पूरे विश्व में तूल पकड़ गया और कई जगह ओलम्पिक मशाल भी प्रभावित हुई।
सिर्फ देसी ही नहीं विदेशी कंपनियाँ भी भारतीय युवकों को विभिन्न क्षेत्रों में रोजगार देने को लालायित हैं। इसके लिए वे मान्य शिक्षण संस्थाओं में कैम्पस सेलेक्शन का भी कार्यक्रम चला रही हैं। लेकिन उनका यह प्रयास उन्हें हद दर्जे निराश कर रहा है।
अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसी संस्थाओं द्वारा कहा जा रहा है कि तेल के मूल्यों में भारी वृद्धि विश्व अर्थव्यवस्था के लिए खतरा है। यह बात भ्रामक है। वास्तव में यह मूल्य वृद्धि भारत समेत दूसरे विकासशील देशों के लिए लाभकारी है। विश्व अर्थव्यवस्था को एक परिवार सरीखा समझें।
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