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वाह मोदी! वाह!!
गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी की पहचान भारतीय राजनीति में अपनी खासियत अलग रखती है। उनके बयानों की तल्खियाँ अभी तक अपने विरोधियों को तिलमिलाती भी रही हैं और बहस का मुद्दा भी बनती रही हैं। लेकिन अहमदाबाद के सीरियल बम ब्लास्ट और सूरत में पुलिस . .
कर्णधारों कुछ तो शर्म करो!
पहले बंगलुरू और फिर अहमदाबाद के दिल दहला देने वाले सीरियल धमाकों के बाद भी जिस तरह से देश की दो बड़ी पार्टियों के राजनेताओं ने बयानबाजी की, उससे इस मुहावरे में कतई अतिशयोक्ति नहीं लगती कि राजनेता वोट की रोटियां इंसानी चिताओं में सेकते हैं।
एक और भुखमरी
भारत की सरकारी संस्थाएं तथा गणमान्य जनप्रतिनिधि मानें या न मानें, भारतीय नागरिकों की भुखमरी के दुःखद समाचार रह-रह कर समाचार माध्यमों में आते ही रहते हैं। ये समाचार इतनी बारीकी से दिए जाते हैं कि इन पर अविश्वास नहीं किया जा सकता।
मनु को कोसने से क्या होगा
जिस मनु ने समाज में वर्ण व्यवस्था के बीज रोपे थे और जिस मनु को वर्ण व्यवस्था की स्थापना के कारण शताब्दियों से कोसा जा रहा है वह मनु अभी मरा नहीं है। बल्कि सच्चाई तो यह है कि वह मनु घर-घर में है। मनु ने तो अपने युग के अनुरूप कर्म के आधार पर समाज को वर्णों में बांटा था . .
दोहरी शिक्षा व्यवस्था का विकराल सच
`निर्धन हो या हो धनवान सबको शिक्षा एक समान', यह नारा यदा-कदा शिक्षक संघों से जुड़े लोग देते हैं, किन्तु इस नारे पर अमल करने के लिए देश में कोई सार्थक प्रयास किया जाता हो, तो ऐसा नहीं है। बात साफ है कि राजनीति ने अपने पैर शिक्षा . .
डील ही डील
यह पंक्तियां लिखे जाने तक स्पष्ट नहीं हो पाया था कि विश्वासमत का ऊँट किस करवट बैठेगा लेकिन इसके पहले की अफरा-तफरी ने जो नज़ारा दिखाया वह अद्भुत था। प्रस्तुत है, डील पर एक नज़रिया- डील ही डील, जहां देखो, जहां सुनो, बस डील ही डील।
100 करोड़ के देश में दो कौड़ी की राजनीति
कांग्रेस, सपा और वामपंथियों के बीच जो आंखमिचौनी विगत दिनों में चली है, उसने भारतीय राजनीति को निर्वसन कर दिया है। भारत की जनता ने हमारे नेताओं और दलों का घिनौना रूप खुल कर देखा। विचारधारा, सिद्धांत, निष्ठा, शिष्टता- जैसे मूल्य कचरे की टोकरी में चले गए।
खाड़ी में बिछ गई है युद्ध और शांति की नई बिसात
हालांकि ईरान बार-बार यह दोहराता आ रहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम हथियारों के लिए नहीं बल्कि अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए है, लेकिन पश्चिमी देश उसकी इस बात को मानने के लिए तैयार नहीं हैं। ईरान से सबसे ज्यादा खतरा इज़राइल महसूस करता है।
घुसपैठियों को आश्रय कब तक
राष्ट्र की अपनी ही समस्याएँ कम नहीं हैं। सुरसा के मुँह की तरह आम आदमी को डंसती महंगाई, देश की कानून-व्यवस्था को धता बताते हुए स्थान-स्थान पर आतंकी विस्फोट, क्षेत्रवाद की राजनीति के चलते पूर्वोत्तर प्रान्तों व महाराष्ट्र में देश के नागरिकों के साथ किया जा रहा दुर्व्यवहार . .
वृद्ध दम्पत्तियों पर कहर
यदि सामाजिक परम्पराएं एवं आदर्श अपनी ही जड़ें खोदने लगें, तो समाज के पास रह ही क्या जाएगा? पत्तों का अस्तित्व तब तक ही हरा-भरा है, जब तक वे वृक्ष की डालियों से जुड़े रहते हैं, शाख से टूटते ही उनके अस्तित्व पर प्रशनचिह्न लग जाता है।
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