वेदकालीन नारी: शक्ति, ज्ञान और संस्कार की प्रतीक

सनातन धर्म के पवित्र ग्रंथ वेदों में नारी को नर के समान धार्मिक, आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक आदि अधिकार प्राप्त थे। वेदों में जिस तरह महालाओं की शिक्षा, गुण, कर्त्तव्य, अधिकार और सामाजिक भूमिका का विस्तृत वर्णन उपलब्ध है, वैसा किसी अन्य धर्मग्रंथ में होगा, सोचना भी कठीन है। वेदों में नारी को देवी, विदुषी, सरस्वती, इन्द्राणी, उषा जैसे आदर सूचक नामों से संबोधित किया गया है। किंतु वर्तमान में माना जाता है कि सनातन धर्म में महिलाओं को दोयम दर्जे का स्थान प्राप्त है, यह सरासर मिथ्या है। इसलिए यहाँ वैदिक काल में महिलाओं की स्थिति पर एक नजर प्रस्तुत है

वेदों में महालाओं को शिक्षा प्राप्त करने और ज्ञान-विज्ञान में निपुण होने का पूरा अधिकार प्राप्त था। महिलाओं को घर की सम्राज्ञी के साथ देश की शासक भी बनने का अधिकार था। इतना ही नहीं महिलाओं को सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय रूप से भाग लेने की पूर्ण स्वतंत्रता थी। इस का शाश्वत उदाहरण कैकयी हैं, जिन्होंने राजा दशरथ की युद्ध में रक्षा की थी। वैदिक काल में कन्याओं को अपना वर चुनने का अधिकार था। उन्हें पिता की संपत्ति में भी अधिकार प्राप्त था। इस तरह वेदों में महिलाओं को वीरांगना और वीर प्रसूता माना गया है।

जहां नारी का सम्मान, वहीं ईश्वर का वास

वेदो में कहा गया है कि जहां महिलाओं का सम्मान होता है, वहां देवता प्रसन्न होते हैं और जहां उनका सम्मान नहीं होता, वहां कोई भी पवित्र कार्य फलदायी नहीं होता है। यह भी कहा गया है कि जिस परिवार में महिलाएं दुःखी रहती हैं, वह शीघ्र ही नष्ट हो जाता है और जिस परिवार में महिलाएँ सुखी रहती हैं, वह सदैव समृद्ध बना रहता है। सनातन धर्म यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता सिद्धान्त का अुनगामी है। वेदकाल में नारी को एक रत्न की संज्ञा दी गयी है।

अथर्ववेद में नारी के सम्मान को वर्णित करने वाला एक श्लोक दृष्टव्य है-

अनुव्रत पितुः पुत्रो माता भवतु सम्मनाः।
जाया परये मतुमतीं वाचं यददु शान्तिवाम्।।

वैदिक कालीन स्त्रा की विदुषिता होने का सबसे उत्कृष्ट उदाहरण विदेह के राजा जनक के दरबार में ऋषि याज्ञवल्क्य और साध्वी गार्गी के मध्य हुआ शास्त्रार्थ है। उस समय नारी-हत्या या मादा-भ्रूण हत्या को पाप माना जाता था। ऐसे अपराध के लिए दंड भी निर्धारित थे। इसलिए यह कहना सरासर अनुचित है कि सनातन धर्म में बाल-विवाह, सती प्रथा या घूंघट की प्रथा थी।

यह भी पढ़ें: सनातन धर्म धार्मिक प्रणाली नहीं, वैज्ञानिक दृष्टिकोण है

स्वयंवर प्रथा में कोई बालिका अपना जीवन-साथी नहीं चुनती थी। नारी को नर के समान ही सम्मान व अधिकार प्राप्त थे। लिंग को लेकर किसी प्रकार का भेदभाव नहीं था। तत्कालीन समाज में व्यक्ति की मानसिकता व आचार-व्यवहार को लेकर भेदभाव व्याप्त था, किंतु लिंग को लेकर नहीं।

पवन गुरु

अब आपके लिए डेली हिंदी मिलाप द्वारा हर दिन ताज़ा समाचार और सूचनाओं की जानकारी के लिए हमारे सोशल मीडिया हैंडल की सेवाएं प्रस्तुत हैं। हमें फॉलो करने के लिए लिए Facebook , Instagram और Twitter पर क्लिक करें।

Related Articles

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

Back to top button