सांस्कृतिक आत्मा के जागरण का आह्वान

सूर्य के उत्तरायण होने पर मनाए जाने वाले मकर संक्रांति पर्व पर प्रकाशित प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का लेख सोमनाथ से काशी तक; सांस्कृतिक संगम में ही बसती है भारत की आत्मा निस्संदेह राष्ट्र की सांस्कृतिक, सामाजिक और राजनीतिक चेतना को नई दिशा देने में समर्थ है। यह लेख महज एक स्मृति नहीं, बल्कि भारत की अटूट आस्था, स्वाभिमान और एकता का घोषणापत्र है। इसमें प्रधानमंत्री ने सोमनाथ मंदिर पर 1026 ई. में महमूद गजनवी के पहले आक्रमण के 1000 वर्ष पूरे होने को सोमनाथ स्वाभिमान पर्व के रूप में मनाने का आह्वान किया है। लेकिन गहराई से देखें, तो यह लेख भारत की आत्मा को सोमनाथ (गुजरात) से काशी (वाराणसी) तक के सांस्कृतिक संगम में बसाने की बात करता है; विविधता में एकता के भारतीय दर्शन को पुनप्रतिष्ठित करता है।

सांस्कृतिक आयाम से शुरू करें। लेख में सोमनाथ को भारत की शाश्वत सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक बताया गया है। सौराष्ट्रे सोमनाथं च… से शुरू होने वाला द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र सोमनाथ की प्राचीनता और आध्यात्मिक महत्व को रेखांकित करता है। प्रधानमंत्री ने बार-बार के आक्रमणों के बावजूद मंदिर के पुनर्निर्माण को भारत की अनादि आस्था का प्रमाण बताया है। यहाँ काशी का उल्लेख सांस्कृतिक संगम के रूप में आता है, क्योंकि काशी विश्वनाथ मंदिर की पुनरुद्धार परियोजना भी सोमनाथ की तरह ही विदेशी आक्रमणों के इतिहास पर खड़ी हुई है।

सामाजिक लचीलापन और समावेशिता: भारत की सामूहिक शक्ति

सोमनाथ पश्चिमी तट पर समुद्री व्यापार और सांस्कृतिक विनिमय का केंद्र था, तो काशी पूर्व में गंगा की गोद में ज्ञान और धर्म का। दोनों के बीच का संगम भारत की अनेकता में एकता को दर्शाता है। मतलब कि, भारत की आत्मा न केवल मंदिरों में, बल्कि विविध परंपराओं – जैन, बौद्ध, हिंदू – के मेल में बसती है। स्वामी विवेकानंद को उद्धृत कर लेख बताता है कि सांस्कृतिक पुनर्जागरण वर्तमान भारत का मूलमंत्र है। इससे युवा पीढ़ी को अपनी जड़ों से जुड़ने की प्रेरणा मिलती है, जो वैश्वीकरण के दौर में सांस्कृतिक क्षरण को रोक सकती है। वैश्विक स्तर पर, यह भारत को सभ्यतागत नेता के रूप में स्थापित करता है, जिसके पास योग, आयुर्वेद और सांस्कृतिक निर्यात के रूप में वैश्विक चुनौतियों का समाधान उपलब्ध है।

सामाजिक नज़रिये से, लेख भारत की सामूहिक शक्ति पर ज़ोर देता है। सोमनाथ के पुनर्निर्माण में अहिल्याबाई होलकर जैसी महिलाओं की भूमिका का जिक्र सामाजिक समावेशिता को उजागर करता है। प्रधानमंत्री ने लिखा है कि आक्रमणों ने समाज की नैतिकता को झकझोरा, लेकिन प्रत्येक पीढ़ी ने उठकर मंदिर को पुनर्जीवित किया। यह सामाजिक लचीलापन आज के संदर्भ में प्रासंगिक है, जहाँ जाति, क्षेत्र और भाषा की दीवारें तोड़कर राष्ट्रीय एकता वक़्त की ज़रूरत है।

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सांस्कृतिक स्वाभिमान से आत्मनिर्भर और विकसित भारत की दृष्टि

काशी का संदर्भ यहाँ सामाजिक संगम के रूप में आता है, जहाँ तमिल संगमम जैसे कार्यक्रमों ने दक्षिण और उत्तर भारत के बीच पुल बनाया। यानी, सांस्कृतिक संगम सामाजिक सद्भाव को मजबूत करता है, जो विभाजनकारी ताकतों के खिलाफ एक हथियार है। सामाजिक रूप से यह लेख हालिया श्रम सुधारों के हवाले से असंगठित श्रमिकों, महिलाओं और युवाओं को सशक्त बनाने की भी बात करता है।

लेख का राजनीतिक आयाम सबसे गहन है। इसमें सरदार पटेल और डॉ. राजेंद्र प्रसाद द्वारा सोमनाथ के पुनर्निर्माण का उल्लेख है, जो तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरु की असहमति के बावजूद संपन्न हुआ था। यह राजनीतिक इच्छाशक्ति की विजय दर्शाता है, जो आज मोदी सरकार की विरासत परियोजनाओं – राम मंदिर, काशी कॉरिडोर – में भी प्रतिबिंबित है।

सोमनाथ से काशी तक का संगम राजनीतिक रूप से विकसित भारत की दृष्टि है, जिसमें सांस्कृतिक पुनरुत्थान आर्थिक विकास से जुड़ता है। यह आत्मनिर्भर भारत का आह्वान है, जिसमें सांस्कृतिक स्वाभिमान राजनीतिक स्वतंत्रता का आधार बनता है। कहना न होगा कि यह दृष्टिकोण विपक्षी दलों के लिए बड़ी चुनौती की तरह है, क्योंकि इसका ज़ोर ऐतिहासिक अन्यायों को संबोधित कर वोट बैंक की राजनीति पर चोट करने पर है। तथापि लेख का यह संदेश एकदम स्पष्ट है कि भारत की आत्मा केवल धार्मिक नहीं, बल्कि बहुआयामी है – सांस्कृतिक संगम में बसी हुई!

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