बेंगलूरु के अलायंस विश्वविद्यालय में राष्ट्रीय संगोष्ठी का हुआ आयोजन

बेंगलूरु, अलायंस विश्वविद्यालय, बेंगलूरु तथा भारतीय भाषा समिति (शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार) के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन सफलता पूर्वक संपन्न हुआ। यह सम्मेलन 9 एवं 10 जनवरी को अलायंस विश्वविद्यालय, बंगलोर के सेंट्रल कैंपस में आयोजित किया गया। देश के विभिन्न राज्यों से विद्वानों, शोधार्थियों और सुधीजनोंने इस सम्मेलन में हाइब्रिड मोड में सहभागिता की।

कन्नड़, तमिल, तेलुगु, मलयालम और हिंदी भाषाओं के आमंत्रित विद्वानों ने अपने विचारों को अत्यंत विस्तार और सारगर्भित ढंग से प्रस्तुत किया। सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में “भारतीय भाषा परिवार: नामक पुस्तक का लोकार्पण किया गया। इस अवसर पर अलायंस विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. प्रेस्टली बी. शान ने कहा कि भारतीय भाषाओं का संरक्षण और युवाओं में उनकी प्रासंगिकता बनाए रखना समय की नितांत आवश्यकता है।

डॉ. प्रेस्टली बी. शान ने अपने अनुभव साझा किए और बताया कि उत्तर भारत में कई वर्षों तक कार्य करते हुए उन्हें भाषा के आधार पर किसी भी प्रकार की समस्या का सामना नहीं करना पड़ा, जो इस बात का प्रमाण है कि हम सभी भावनात्मक रूप से एक-दूसरे से जुड़े हैं। डॉ. शान ने भारतीय भाषा समिति के प्रति आभार व्यक्त किया और भविष्य में सहयोगात्मक कार्य की इच्छा व्यक्त की। मुख्य अतिथि डॉ. रोहिणी श्रीवत्स ने भाषाओं की भूमिका और उनके जीवन में महत्व पर प्रकाश डाला।

भाषा, पहचान और समावेशन पर विशेषज्ञों के विचार

डॉ. प्रेस्टली बी. शान ने कहा कि तकनीकी क्षेत्र में भाषाओं पर कार्य जारी है और कई विषयों पर अभी भी अनुसंधान की आवश्यकता है। उन्होंने सम्मेलन में लोकार्पित दोनों पुस्तकों की सराहना की। विशिष्ट अतिथि अक्कई पदमशाली, कर्नाटक राज्य की सुप्रसिद्ध लेखिका, गायिका और सदस्य, कर्नाटक साहित्य अकादमी ने भाषाओं को व्यक्ति की पहचान बताया। उन्होंने भारतीय भाषाओं के विस्तार के साथ-साथ ट्रांसजेंडर समुदाय की भाषा पर भी कार्य करने का सुझाव दिया।

डॉ. प्रेस्टली बी. शान ने कहा कि समाज के युवा भले ही उपेक्षित हों, उनके संस्कारों और भाषाओं का सम्मान आवश्यक है। पदमशाली जी ने अपनी बात शारदा वनदान गीत प्रस्तुत कर समाप्त की। दूसरे विशिष्ट अतिथि प्रो. हितेन्द्र कुमार मिश्र, निदेशक, केंद्रीय हिंदी निदेशालय, नई दिल्ली ने भाषाओं और बोलियों के परस्पर संबंध पर अपने विचार रखे। उन्होंने बताया कि पूर्वोत्तर भारत में रहते हुए उन्होंने महसूस किया कि भारतीय भाषाएं इतनी भिन्न नहीं हैं कि उनके लिए अलग-अलग परिवार का वर्गीकरण किया जाए।

प्रो. मिश्र ने कहा कि “भारतीय भाषा परिवार” पुस्तक भाषाओं को समझने की एक नई दृष्टि प्रदान करती है और लोगों के मन में भाषाओं के प्रति भ्रांतियों को दूर करने में सहायक होगी। अंत में अभिषेक प्रकाश जी ने धन्यवाद ज्ञापन करते हुए उद्घाटन सत्र का समापन किया। तीय सत्र के पहले प्रमुख वक्ता प्रो. गिरीश नाथ झा थे। उन्होंने कहा कि श्रीमान चामू कृष्ण शास्त्री जी के नेतृत्व में कार्य कर रही भारतीय भाषा समिति का उद्देश्य भारतीय भाषाओं के मध्य समानता को समझना और आत्मसात करना है।

भारतीय भाषाओं की समान जड़ों पर विद्वानों की एक राय

प्रो. मिश्र ने पाणिनी के व्याकरण और तमिल भाषा के व्याकरण के बीच समानता, उच्चारण की भिन्नता और भाषाई विज्ञान में एकरूपता पर विस्तार से चर्चा की। डॉ. झा ने यह भी बताया कि व्याकरणिक दृष्टि से भारत की सभी भाषाएं बहुत हद तक समान हैं। दूसरे प्रमुख वक्ता डॉ. पी. श्री कुमार (केरल केंद्रीय विश्वविद्यालय) थे। डॉ. कुमार ने लोकार्पित पुस्तक में लेखकीय योगदान दिया है। उन्होंने मलयालम भाषा की सूक्ति से अपनी प्रस्तुति आरंभ की और पाश्चात्य आलोचकों के उद्धरणों के माध्यम से यह बताया कि भारतीय भाषाओं में इतनी भिन्नता नहीं है कि उन्हें अलग-अलग परिवारों में वर्गीकृत किया जाए।

प्रो. मिश्र ने यह भी बताया कि भाषाओं का अध्ययन व्यक्ति को दूरदर्शी बनाता है और तुलनात्मक दृष्टि विकसित करता है। डॉ. कुमार ने यह भी कहा कि भाषाओं को जानने का उद्देश्य केवल बोलचाल नहीं, बल्कि लिखित रूप और लिपियों से परिचय प्राप्त करना भी है। अंत में उन्होंने भारतीय भाषा समिति का आभार व्यक्त किया और श्रोताओं से पुस्तक पढ़ने एवं समीक्षा करने का आग्रह किया। यहीं द्वितीय सत्र का समापन हुआ।

तृतीय सत्र के मुख्य वक्ता थे: डॉ. वी. आर. जगन्नाथन (सेवानिवृत्त निदेशक, मानविकी संकाय, IGNOU) डॉ. श्रद्धा सिंह (बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय) डॉ. प्रीति के (हिन्दी विभागाध्यक्ष, कन्नूर विश्वविद्यालय, केरल) डॉ. समीर रंजन (सेवानिवृत्त राजभाषा अधिकारी, अनुवादक और आलोचक, बंगलोर) डॉ. एस. ए. मंजुनाथ (हिन्दी विभागाध्यक्ष, पोपै कॉलेज, मंगलूर) श्री टी. मैथ्यू (सीनियर डायरेक्टर, मार्केटिंग और कम्यूनिकेशन, अलायंस विश्वविद्यालय) डॉ. के. ए. सेबास्टियन (हिन्दी विभागाध्यक्ष, क्राइस्ट विश्वविद्यालय, बंगलोर) सत्र में सभी वक्ताओं ने भारतीय भाषाओं के मध्य अंतःसंबंध को अपनी मातृभाषा के संदर्भ में व्यक्त किया।

भाषाई भिन्नताओं में छिपी भारतीय एकता

डॉ. प्रीति के ने कहा कि हिन्दी साहित्य की पुस्तकों का अध्ययन करने पर उन्हें कई शब्द मिले जो मलयालम और हिन्दी दोनों में हैं, लेकिन अर्थ में भिन्न हैं। डॉ. के. ए. सेबास्टियन ने डॉ. प्रीति के से सहमति जताते हुए कहा कि भाषाओं में समानता है, बस उस पर नई दृष्टि से कार्य करने की आवश्यकता है। उन्होंने उल्लेख किया कि तमिल, कन्नड़ और मलयालम साहित्य की कई पुस्तकें हिन्दी में अनूदित नहीं हैं। डॉ. श्रद्धा सिंह ने व्याकरणिक दृष्टि से सभी भारतीय भाषाओं के समानता और उत्पत्ति मूलक तथा प्रारूप मूलक प्रणालियों का व्यापक विश्लेषण प्रस्तुत किया।

डॉ. समीर रंजन ने कहा कि भारतीय भाषाएं चोटी की तरह एक साथ गूँथी हुई हैं और उन्हें अलग नहीं किया जा सकता। उन्होंने भाषाई विविधता के संदर्भ में मानवीय एकता का उदाहरण देते हुए कहा कि विपदा में भाषा के भेद मिट जाते हैं और मानवता सर्वोपरि होती है। डॉ. टी. मैथ्यू ने मार्केटिंग और कम्यूनिकेशन में भाषाओं के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने बताया कि सरल और आकर्षक भाषा का प्रयोग ब्रांडिंग और लोकल मार्केट में सफलता के लिए आवश्यक है।

सत्र की अध्यक्षता डॉ. वी. आर. जगन्नाथन ने की और सभी वक्ताओं की प्रशंसा करते हुए कहा कि यह सत्र भारतीय भाषा परिवार के संदर्भ में अत्यंत सफल रहा। उन्होंने बताया कि इस सत्र में उपस्थित प्रोफेसर विभिन्न मातृभाषाओं के हैं और कई भाषाओं में दक्षता रखते हैं, जो भाषाई एकता और विश्लेषण को समझने के लिए आवश्यक है। सत्र का समापन इसी के साथ हुआ।

छात्रों के सवालों से जीवंत हुई भाषा पर खुली चर्चा

चतुर्थ सत्र ओपन डिस्कशन का रहा, जिसमें छात्रों की सहभागिता अधिक रही। इस सत्र की अध्यक्षता श्रीमान टी. मैथ्यू ने की।
अलग-अलग प्रांतों के छात्रों ने अपनी बात रखनी शुरू की। सबसे पहला प्रश्न यह उठा कि इतने व्यस्त शेड्यूल में दूसरी भाषा सीखने के लिए समय कहाँ से आएगा? यदि किसी को भाषा सीखनी है, तो यह व्यक्ति की इच्छा और परिस्थिति पर निर्भर होना चाहिए। ऐसे में अलग क्लास चलाने और कोर्स ऑफर करने का औचित्य क्या है?

दूसरा प्रश्न यह उठाया गया कि बाहर प्रदेश से आए छात्र हमारी भाषा और संस्कृति को अपनाने की बजाय उसे दूषित कर रहे हैं। इस पर स्कूल डिजाइन के छात्रों ने उत्तर दिया कि भाषा फोर्स करके नहीं सिखाई जाती, बल्कि यह स्वाभाविक रूप से सीख ली जाती है।इस चर्चा में बंगलोर के कई विश्वविद्यालय भी शामिल हुए और उन्होंने अपने दृष्टिकोण प्रस्तुत किए। डॉ. ज्योत्सना सोनी ने कहा कि भाषा सीखना कई मायनों में उपयोगी है, क्योंकि भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि संस्कार और पहचान भी देती है।

भाषा से अलग रहकर हमारी पहचान अधूरी रहती है और यह हमारे व्यक्तित्व को भी प्रभावित करती है। सभी ने अपने-अपने अनुभव और दृष्टिकोण साझा किए। अंत में टी. मैथ्यू जी ने निष्कर्ष प्रस्तुत किया कि कैसे बिजनेस, डिजाइन, मार्केटिंग, लॉ आदि विभिन्न क्षेत्रों में भाषाई बदलाव आ रहे हैं और भाषाओं का ज्ञान रखने वाले व्यक्तियों को प्राथमिकता मिलती है। उन्होंने कहा कि सभी भारतीय भाषाओं का सम्मान करते हुए जितनी संभव हो उतनी भाषाएं सीखनी चाहिए, राजनीति से परे रहकर। इसके साथ दिन के प्रथम चार सत्र सफलतापूर्वक समाप्त हुए।

बहुभाषिक सत्रों में शोध और विचारों की समृद्ध प्रस्तुति

इस सत्र का संचालन मलयालम और तमिल भाषाओं में किया गया। इसमें कुल पाँच प्रमुख वक्ता शामिल थे, जिनमें तीन मलयालम भाषा के और दो तमिल भाषा के थे। मलयालम भाषा के कमेस्ट्री प्रोफेसर और साहित्यकार डॉ. विनोद टी. पी., डॉ. रीजा वी., डॉ. दिव्या, डॉ. एन. पुननिया मूर्ति और डॉ. सरला ने अपनी प्रस्तुतियों में मलयालम और तमिल भाषा की पुरातनता और वैज्ञानिक महत्ता पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि प्राचीन भारतीय लिपियों और उनके वैज्ञानिक आधार को समझना न केवल भाषाई इतिहास के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि यह हमें भाषाओं के गहन संरचनात्मक ज्ञान से भी अवगत कराता है।

इस सत्र का संचालन कन्नड़ और तेलुगु भाषाओं में किया गया। कार्यक्रम से पूर्व कई कन्नड़ प्रोफेसरों और शोधार्थियों ने जुड़ने की इच्छा जताई और रजिस्ट्रेशन भी किया था, लेकिन बाहरी आमंत्रित सभी अतिथि उस दिन उपस्थित नहीं हो सके। ऐसे में अलायंस विश्वविद्यालय के प्रोफेसरों ने ही अपने विचार प्रस्तुत किए। इस दौरान चार पेपर कन्नड़ भाषा में पढ़े गए। तेलुगु भाषा में चार कंप्यूटर साइंस प्रोफेसरों – डॉ. एम. वी. मदन कुमार कुकुनुरी, डॉ. अशोक सराबू, डॉ. गिरीश बी. एम., और डॉ. विवेकानंद जगन्नाथन – ने भारतीय भाषाओं को शिक्षा और ज्ञान प्रणालियों के संदर्भ में प्रस्तुत किया। उन्होंने यह बताया कि कैसे भाषाओं का अध्ययन केवल संवाद तक सीमित नहीं है, बल्कि यह शिक्षा, तकनीकी ज्ञान और ज्ञान संचरण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

इस सत्र में चार समानांतर सत्रों में कुल 73 पेपर प्राध्यापकों और शोध छात्रों द्वारा प्रस्तुत किए गए। इसके अतिरिक्त, अलायंस विश्वविद्यालय के स्नातक स्तर के छात्रों ने भी अपने विचार साझा किए। सत्र में भाषाओं के भविष्य, भारतीय भाषाओं में अनुसंधान के नए आयाम, और बहुभाषिक ज्ञान प्रणाली में नवाचार पर जोर दिया गया। छात्र-शोधार्थियों की सक्रिय सहभागिता ने चर्चा को और अधिक प्रभावशाली और समृद्ध बनाया।

अब आपके लिए डेली हिंदी मिलाप द्वारा हर दिन ताज़ा समाचार और सूचनाओं की जानकारी के लिए हमारे सोशल मीडिया हैंडल की सेवाएं प्रस्तुत हैं। हमें फॉलो करने के लिए लिए Facebook , Instagram और Twitter पर क्लिक करें।

Related Articles

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

Back to top button