पूर्वोत्तर की एकजुट आवाज़ : एक नई उम्मीद
पूर्वोत्तर भारत के राजनैतिक क्षितिज पर एक महत्वपूर्ण घटना घटी है। चार प्रमुख क्षेत्रीय नेताओं ने दिल्ली में संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस कर वन नॉर्थ ईस्ट नामक एक एकीकृत राजनीतिक मंच लाँच किया है। इस मंच का उद्देश्य क्षेत्र की आदिवासी समुदायों की आवाज को राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत करना है। इस गठबंधन में मेघालय के मुख्यमंत्री कोनराड के संगमा (नेशनल पीपुल्स पार्टी), त्रिपुरा की तिप्रा मोथा के संस्थापक प्रद्योत पाम मानिक्य देबबर्मा, असम की पीपुल्स पार्टी के डेनियल लांगथासा और नागालैंड के भाजपा प्रवक्ता एमहोनलुमो किकोन शामिल हैं।
इनमें से तिप्रा मोथा और नेशनल पीपुल्स पार्टी (एनपीपी) भाजपा के नेतृत्व वाले नॉर्थ-ईस्ट डेपोटिक अलायंस (नेडा) का हिस्सा हैं, जिसकी कमान असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा सँभालते हैं। यह नई इकाई क्षेत्रीय मुद्दों को मजबूत आवाज देने के लिए बनी है, जिसमें भूमि अधिकार, घुसपैठ रोकना, स्थानीय संस्कृति की रक्षा और विकास की माँगें प्रमुख होंगी। यह कदम न केवल पूर्वोत्तर की राजनीति को नया आयाम देगा, बल्कि केंद्र-राज्य संबंधों को भी प्रभावित करेगा।
पूर्वोत्तर की जटिल राजनीति और सांस्कृतिक विविधता
ग़ौरतलब है कि पूर्वोत्तर भारत की राजनैतिक पृष्ठभूमि हमेशा से जटिल रही है। यह क्षेत्र आठ राज्यों – असम, अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मणिपुर, मिजोरम, त्रिपुरा, मेघालय और सिक्किम – से मिलकर बना है। यहाँ 200 से अधिक जनजातियाँ निवास करती हैं। इनकी भाषाएँ, संस्कृतियाँ और परंपराएँ इतनी विविध हैं कि इसे भारत का सांस्कृतिक मोज़ेक कहा जाता है। स्वतंत्रता के बाद से यहाँ अलगाववाद, विद्रोह और क्षेत्रीय असंतोष की लहरें चली हैं।
नागा विद्रोह से लेकर, असम आंदोलन और मणिपुर संघर्ष तक, पूर्वोत्तर ने केंद्र की नीतियों से दूरी महसूस की है। राष्ट्रीय दलों ने यहाँ की राजनीति में पैठ ज़रूर बनाई, लेकिन आदिवासी हितों की रक्षा के लिए हमेशा स्थानीय दल सक्रिय रहे। ये दल अक्सर केंद्र पर निर्भर रहते हुए भी अपनी पहचान बनाए रखते हैं। हाल के वर्षों में, सीएए विरोध, सीमा विवाद और बाढ़-भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदाओं ने क्षेत्रीय एकता की कमी को उजागर किया।
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पूर्वोत्तर की राजनीति में एकजुटता की नई पहल
अब ये चार दल एकजुट होकर एक पैन-रीजनल मंच बना रहे हैं, जो पिछले लोकसभा चुनावों के बाद भाजपा के साथ गठबंधन टूटने की आशंकाओं से प्रेरित लगता है! इस घोषणा के निहितार्थ गहरे हैं। पूर्वोत्तर की राजनीति में बिखराव हमेशा कमजोरी का कारण रहा है। अलग-अलग दल अपनी-अपनी माँगें उठाते रहे, लेकिन संसद में एकजुट आवाज की कमी से मुद्दे दब जाते थे।
यह नई इकाई एक एकल मंच की तरह काम करेगी, जो स्थानीय अधिकारों, जल-जंगल-जमीन की रक्षा और बांग्लादेश सीमा पर घुसपैठ रोकने जैसे मुद्दों पर केंद्रित होगा। कोनराड संगमा ने स्पष्ट किया है कि यह मंच केंद्र-विरोधी नहीं, बल्कि समन्वयकारी होगा। इससे क्षेत्रीय दलों को मजबूती मिलेगी। वे राष्ट्रीय दलों के कथित दबाव से मुक्त हो सकेंगे। सांस्कृतिक रूप से, इससे जनजातीय एकता को बढ़ावा मिलेगा। त्योहारों की विविधता एक साझा धागे में बँधेगी। राजनैतिक रूप से, यह पूर्वोत्तर को एक क्षेत्र, एक आवाज का मंत्र देगा।
भविष्य की दृष्टि में, यह इकाई पूर्वोत्तर को भारत की मुख्यधारा से जोड़ने का अवसर है। यदि यह सफल रही, तो इससे एक्ट ईस्ट पॉलिसी को गति मिलेगी। सयाने कह रहे हैं कि सफलता के लिए इस इकाई का समावेशी होना जरूरी है। यानी, इसमें सभी जनजातियों को शामिल किया जाए, न कि सिर्फ प्रमुख चार दलों को। केंद्र को भी सहयोगी रवैया अपनाना चाहिए – जैसे आर्टिकल 371 की सुरक्षा मजबूत करना। अन्यथा, यह भी कहीं एक और राजनैतिक प्रयोग भर न साबित हो! कुल मिलाकर, यह कदम पूर्वोत्तर की उस 5 करोड़ आबादी के लिए उम्मीद की नई किरण है, जो अरसे से हाशिये पर रही है।
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