युवाओं के बीच नये सिरे से लोकप्रिय होती अभंग कविता

अभंग कविता एक विशेष प्रकार की भक्ति-रचना है। मराठी में खासकर अभंग रचनाएं अतीत में खूब लिखी गईं। अभंग का मतलब है, जो भंग न हो, जो कभी टूटे नहीं। इसलिए अभंग रचना एक शाश्वत और अमर होती है। यह छोट-छोटे पदों में लिखी जाती है, जो अक्सर चार चरणों वाली होती है।

अभंग कविताएं बेहद सरल व सुबोध भाषा में होती हैं, ताकि आम लोग उसे सहजता से समझ सकें। अतीत में अभंग कविता का मुख्य स्वर ईश्वर-भक्ति, संत महिमा और जीवन की सच्चाई रहा।

इन्हें संगीतबद्ध करके कीर्तन-भजन के रूप में गाया जाता है। इन रचनाओं में भावनाओं की गहराई होती है, जिसे संगीत लोकप्रियता के शिखर पर पहुंचाता है। अतीत में सबसे ज्यादा अभंग रचनाएं संत तुकाराम, संत नामदेव, संत ज्ञानेश्वर और संत एकनाथ आदि ने की। भक्ति काल की लोकप्रिय अभंग कविता वर्तमान में महाराष्ट्र में पुन लोकप्रिय हो रही है।

अभंग की लोकप्रियता: युवाओं को भा रही सहज भाषा

इसलिए आज के साहित्यिक और सांस्कृतिक परिदृश्य में अभंग कविताओं पर विचार करना जरूरी है। भले ही यह पहले की तरह पारंपरिक भक्ति-रचना न हो, लेकिन वर्तमान में इसकी लोकप्रियता के कई कारण हैं। आज युवा भाषा की सहजता पसंद करते हैं और अभंग रचनाएं सहज भाषा में लिखी जाती हैं।

इसलिए आज के युवाओं को ये रचनाएं नये सिरे से आकर्षित कर रही हैं। दरअसल हिंदी की तरह मराठी में भी बीच में संस्कृतनिष्ठ मराठी के चलन पर जोर दिया गया, लेकिन हाल के दशकों में कविता और गद्य में जनभाषा, क्षेत्रीय लहज़ा और बोल-चाल की शैली का प्रयोग बढ़ा है, इसलिए नये सिरे से नई ज़मीन पर लिखी गई अभंग रचनाएं खूब लोकप्रिय हो रही हैं।

नामदेव ढसाल

इन्हें आज फ्यूज़न के तर्ज पर भजन और सूफी लोक-गायन में इस्तेमाल किया जाता है। आज की अभंग कविताएं लोक-राग में रूपातांरित होकर युवाओं को खूब आकर्षित कर रही हैं। आज का युवा धार्मिकता की जगह आध्यात्मिकता की तरफ आकर्षित हो रहा है। इसलिए कभी भक्ति-रस में पगी अभंग रचनाएं आज आध्यात्मिकता का सार बनकर सामने आई हैं। आज की अभंग रचनाएं सामाजिक चेतना से लेस हैं। अभंग रचनाएं समतावादी और जाति-विरोधी होती हैं और दलित साहित्य का केंद्रीय स्वर हैं।

यही कारण है कि संत तुकाराम और नामदेव की परंपरा आज की नई अभंग कविताओं में बखूबी देखने को मिलती है। बीच में लंबे समय तक कविताओं से संगीत गायब हो गया था, मगर अभंग रचनाएं कभी भी संगीत से बाहर नहीं गईं। आज की पब्लिक पोयट्री रीडिंग्स, स्लैम पोयट्री और स्ट्रीट थियेटर में अभंग कविताओं को खूब तरजीह मिल रही है।

हालांकि यह कहना भी सही नहीं है कि अभंग कविताओं को मराठी और मराठी मिश्रित हिंदी में नये सिरे से जगह मिल रही है। सच बात तो यह है कि मराठी और महाराष्ट्र में मराठी मिश्रित हिंदी से अभंग कविता का दौर कभी पूरी तरह से गया ही नहीं। दलित साहित्य में तो खास करके नामदेव ढसाल और कुमुद पवार जैसे लेखकों की कविताओं ने संत नामदेव और तुकाराम की परंपरा का बढ़-चढ़कर विस्तार किया है, जो आज भी नये संदर्भों और नये मुहावरों में मराठी की अभंग रचनाओं में मौजूद हैं।

अभंग कविता: आज भी जीवंत और ऊर्जावान

कुमुद पवार

यही कारण है कि मराठी लोकनाट्य और रंगमंच से जुड़े लोग कभी भी अभंग से दूर नहीं हुए थे। भले एक ज़माने में अभंग रचनाएं सिर्फ मराठी भाषियों को ही आकर्षित करती रही हों, लेकिन आज जब कैलाश खैर, अवधूत गुप्ते तथा महेश काले के म्यूजिक बैंड ने इसमें परंपरा और मॉडनिटी का रंग भरा, तो इसकी लोकप्रियता में मराठी और गैर-मराठी का भेद काफी हद तक मिट गया।

सेलिब्रिटी गायकों ने अपने म्यूजिक बैंड के जरिये अभंग को कविता के साथ लोकप्रिय संगीत रचनाओं के रूप में नया जीवन-दान दिया है।कोरोना काल और दलित आंदोलनों के दौरान कई कवियों ने इन कविताओं में आस्था, भय और आत्मनिष्ठता का नया स्वर भरा है, तो अभंग की भाषा और उसकी लय युवाओं को नये सिरे से आकर्षित की है।

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कविता विधा के रूप में अभंग कविता का नये सिरे से विकास हुआ है, जो भक्ति की पारंपरिक विधा से हटकर सूफी, लोकचिंतन और आत्मचिंतन के सामूहिक रूप में चेतना के नये प्रारूप के रूप में अभंग कविता ने नये अनुभव और नये तेवर पेश किए हैं। सोशल मीडिया, यू-ट्यूब, स्टूडियो, स्फोटीफाई और युवा बैंड की गिटार की धुनों में भी अभंग कविताएं नये जोश और उमंग के साथ गूंज रही हैं, जिसका साफ मतलब है कि कविता की अभंग विधा न केवल जीवित है, बल्कि जबर्दस्त जीवन ऊर्जा के साथ आगे बढ़ रही है।

लोकमित्र गौतम

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