आखिर पैसे वाले ही क्यों होते हैं डिजिटल अरेस्ट?
सिर्फ सिम निष्क्रिय करने, खाते सीज करने या फिर रिपोर्ट दर्ज कराकर जांच करने से कुछ होता तो अमर सिंह चहल को यह कदम उठाने की नौबत नहीं आती। हां, पुलिस का मित्रतापूर्ण व्यवहार,पारदर्शी कार्यप्रणाली, तेज और निष्पक्ष कार्यवाही अगर चलन में आ जाए तो ओटीपी, जॉब, डिलीवरी स्कैम, क्रेडिट कार्ड लिमिट इनक्रिस के साथ ही घर में ही मोबाइल-लैपटॉप-टैब अरेस्ट पर रोक लग सकती है। डिजिटल अरेस्ट कोरोना के बाद चलन में आया और इस पर भी कोरोना वैक्सीन जैसे किसी कानूनी अभियान से ही काबू पाया जा सकता है।
गुजरे कल यानी 23 दिसंबर 2025 की सुबह पूरे देश के लिए भयंकर दर्द देने वाली रही, जब सभी समाचार पत्रों में और सोशल मीडिया पर पंजाब के पूर्व आईजी अमर सिंह चहल द्वारा साइबर ठगी में आठ करोड़ से अधिक की धनराशि गंवा देने के बाद आत्महत्या करने के प्रयास का समाचार छपा। इस आत्महत्या के प्रयास ने न सिर्फ सभी को चौंकाया बल्कि देश की कानून बनाने वाली संस्थाओं, कानून का पालन करने वाली संस्थाओं, कानून का पालन करने वाले और जनता की मदद करने वाली एजेंसियों पर भी एक प्रश्नचिन्ह लगा दिया कि कहीं ऐसा तो नहीं कि देश की जनता का डिजिटल अरेस्ट होना,उनके प्रति अविश्वास है?
जिंदगी भर की कमाई लील रहा है डिजिटल अरेस्ट
नई सदी के पहले सिल्वर जुबली साल यानी पच्चीस वर्ष या यूं कहा जाए कि वर्ष 2025 अब बस जाने को ही है और जाते-जाते यह साल कुछ परिवारों को जो जख्म देकर जा रहा है, उसे भूलने में कम से कम एक पीढ़ी तो खप ही जायेगी। कुछ परिवारों के दर्द तो आम कहावत में कम से कम तीन पुश्तों तक सालते रहेंगे। इस सदी में सबसे बड़ा दर्द बनकर उभरा है डिजिटल अरेस्ट,जो साइबर क्राइम का एक महत्वपूर्ण और सर्वाधिक दहशत पैदा करने वाला हिस्सा है। इस साइबर अरेस्ट में शिकार अपने जीवन की कमाई गंवा देता है।
अमर सिंह चहल प्रकरण एक उदाहरण मात्र है और देश में अब तक हुए साइबर क्राइम के मामलों में संभवतः सबसे बड़ों में से एक। अभी तक एक से दो, तीन करोड़ रुपये तक के साइबर क्राइम या डिजिटल अरेस्ट अपराध सामने आते रहे हैं। डिजिटल अरेस्ट और साइबर क्राइम दोनों एक ही धंधे के अंग हैं, बस अंतर सिर्फ इतना है कि डिजिटल अरेस्ट में शिकार प्रत्यक्ष डरता है और साइबर क्राइम आपके साथ कब हो जाएगा पता नहीं चलता। आप लाख चालाक होने के बाद भी साइबर ािढमिनल्स या फ्रॉड के चक्कर में आ ही जाते हैं। अमर सिंह चहल इसके ताजा उदाहरण हैं जो न सिर्फ कानून के रखवाले थे बल्कि न जाने उन्होंने कितने मामले ऐसे देखे होंगे, जिसमें जनसामान्य फंसकर उनके पास आए होंगे।
सरकारी एजेंसियों के नाम से डर फैलाकर की जा रही ठगी
चलिए अब यह समझते हैं कि आखिर डिजिटल अरेस्ट का फंदा उन लोगों पर क्यों गिरता है, जो या तो बुजुर्ग हैं अथवा जिनकी बड़ी धनराशि बैंकों, पोस्ट ऑफिस या कहीं दूसरी जगह जमा है, बड़े पदों से रिटायर हुए हैं, जिनकी उम्र वह है जिसमें डर सामान्य जीवन में सर्वाधिक आसान होता है? आज तक का इतिहास देखा जाए तो डिजिटल अरेस्ट ऐसे लोग नाममात्र को ही हुए होंगे, जिनके पास रोटी खाने मात्र की धनराशि होगी। यह क्या आश्चर्य नहीं है कि आज भिखारी भी डिजिटल तरीके से भीख मांगते हैं या फिर स्मार्टफोन रखते हैं। लेकिन वह कभी इस तरह के शिकार नहीं हुए।
कहने का तात्पर्य यह है कि जिनके पास धन की बहुतायत नहीं है, वह डिजिटल स्कैमरों या फंदेबाजों के फंदे में बहुत कम या बिल्कुल नहीं फंस रहे। डिजिटल अरेस्ट किसके नाम पर हो रहे हैं? सीबीआई, पुलिस, संचार सेवा, ईडी, बैंक, आयकर, जीएसटी, हाउसिंग सोसायटी तथा कस्टम अधिकारी, ऐसे नाम हैं जिनके नाम से हर किसी की हिम्मत टूट जाती है और वह कहां चक्कर में फंस गया या अब क्या होगा जैसे वाक्य सोचते हुए उनसे छुटकारा पाने की सोचता है।
सरकार के यह सभी विभाग जनता की सहायता या कानूनी प्रक्रिया को पूरा करने के लिए हैं, लेकिन एक बार जो इनके फंदे में आ गया उसका उससे निकलना एक जंग जीतना होता है और इसी कमी का लाभ डिजिटल फंदेबाज उठाकर कमाई कर रहे हैं। आंकड़ों को देखें तो भारत में वर्ष 2024 में 1.25 लाख से अधिक लोग करीब 2,140 करोड़ की ठगी का शिकार इसी माध्यम से हुए।
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पुलिस और जांच एजेंसियों के नाम से ठगी का बढ़ता जाल
जो वर्ष 2022 में हुए 40 हजार मामलों में 92 करोड़ की ठगी के विपरीत थे। इस साल में यह संख्या लगभग दो लाख के करीब पहुंचने की संभावना है। वैसे वर्ष 2025 के आरंभिक दो माह में ही करीब 211 करोड़ रुपए ठगे जा चुके थे। गत एक दशक में देश में बैंको ने 65 हजार से अधिक 4.69 लाख करोड़ रुपये की ठगी की सूचना दी थी। रिजर्व बैंक तो देश में वर्ष 2023 में तीस हजार करोड़ रुपये की धोखाधड़ी की बात कहता है।
साइबर विशेषज्ञ तथा समाज सेवक मानते हैं कि आम जनता आज भी इनकम टैक्स या फिर मोबाइल सिम से हुए अपराध के नाम से डरती है। वह पुलिस स्टेशन के चक्कर लगाने से इतना डरती है कि डिजिटल फंदेबाजों पर विश्वास करके अपनी हिम्मत गंवा देती है और फिर खाते की रकम बिना किसी को बताए, उनके हवाले कर देती है। जब डर की वजह यह हो तो कैसे मान लिया जाए कि हम अपराधियों में डर और आमजन में विश्वास के ध्येय वाक्य की दुनिया में जी रहे हैं?
आईएएस, आईपीएस, जज, डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षक यहां तक कई कि बार कस्टम और संचार विभाग के अफसर भी फर्जी गिरफ्तारी में आ जाते हैं। प्रश्र यह है कि इस डिजिटल अरेस्ट से बचने के लिए क्या किया जाए? विशेषज्ञ कहते हैं कि जब सरकार और उसके विभाग इस बात के लिए हर वर्ष करोड़ों रुपए खर्च करते हैं कि आम जनता इस तरह के अपराधियों से बचें। वह उन्हें यह भी बताते हैं कि कोई भी विभाग डिजिटल अरेस्ट नहीं करता, तो फिर भी जनता उन पर विश्वास क्यों नहीं करती?
सिर्फ सिम ब्लॉक नहीं, सख्त सजा जरूरी
यदि जनता का विश्वास जीतना है, तो सरकारी नियमों को इतनी लचीला तथा जिम्मेदार अफसरों को इतना सरल बनाना होगा कि आम जनता उनके सामने जाकर अपनी बात रख सके। हां, सोशल मीडिया को तो रोकना ही होगा, जिसमें रोज हजारों ऐसे समाचार होते हैं कि-आपकी सिम जांचिए कहीं वह अपराधियों के कब्जे में तो नहीं या एयरपोर्ट पर कितना सोना ले जा सकते हैं, बैंक एफडी तो कहीं साइबर अपराधियों के निशाने पर तो नहीं?
सही बात तो यह है कि आज बैंकों की गुप्त जानकारी, मोबाइल नंबर, व्यक्तिगत खरीद-बेचने की सूचनाएं नाममात्र के पैसे देकर आसानी से मिल जाती हैं। जब यह अत्यधिक संवेदनशील जानकारी मार्केट में आसानी से उपलब्ध हैं, तो डिजिटल फंदेबाज क्यों नहीं अपना शिकार आसानी से तलाश लेंगे? डिजिटल क्राइम या फ्रॉड रोकने के लिए न सिर्फ पुलिस को बिना किसी दबाव के काम करने की आदत डालनी होगी बल्कि राजनीतिज्ञ हस्तक्षेप खत्म करना जरूरी है।

जिस तरह से अपराधियों के एनकाउंटर या फिर सजा देने की परंपरा है, उसी तरह से डिजिटल स्कैमरों के खिलाफ भी कानूनी प्रक्रिया करनी होगी। सिर्फ सिम निष्क्रिय करने, खाते सीज करने या फिर रिपोर्ट दर्ज कराकर जांच करने से कुछ होता तो अमर सिंह चहल को यह कदम उठाने की नौबत नहीं आती। हां, पुलिस का मित्रतापूर्ण व्यवहार,पारदर्शी कार्यप्रणाली, तेज और निष्पक्ष कार्यवाही अगर चलन में आ जाए तो ओटीपी, जॉब, डिलीवरी स्कैम, क्रेडिट कार्ड लिमिट इनक्रिस के साथ ही घर में ही मोबाइल-लैपटॉप-टैब अरेस्ट पर रोक लग सकती है। डिजिटल अरेस्ट कोरोना के बाद चलन में आया और इस पर भी कोरोना वैक्सीन जैसे किसी कानूनी अभियान से ही काबू पाया जा सकता है।
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