ग्रेट निकोबार में घनघनाता अलार्म

ग्रेट निकोबार में अलार्म लगातार घनघना रहा है। खतरे की घंटी लगातार बज रही है। मगर उसकी आवाज को लगातार अनसुना किया जा रहा है। घड़ी की सुइयां तेजी से घूम रही हैं और फैसले-दर-फैसले भयावह आपदा का सामान जुटा रहे हैं। पर्यावरणविद् सचेत हैं और वे भी जो प्रकृति और आदिवासियों से प्रेम और उनकी परवाह करते हैं। विभिन्न मंचों से उन्होंने अपनी चिंताओं का इजहार भी किया है। उद्विग्न जनों ने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में भी दस्तक दी है, मगर बात बनती नहीं दीखती और अनिष्ट की आशंका बढ़ती जा रही है।

ग्रेट निकोबार अंडमान और निकोबार समूह का सबसे दक्षिणी और सुदूरवर्ती द्वीप है। पारिस्थितिकी के मान से अत्यंत समृद्ध यह द्वीप यूनेस्को बायोस्फीयर रिजर्व है। यहां प्राचीनतम, दुर्लभ और अछूते वर्षावन की समृद्ध विरासत विद्यमान है। द्वीप का भू-राजनीतिक और सामरिक महत्व भी निर्विवाद है। यहां विलुप्तप्राय शोम्पेन जनजाति निवास करती है। सुनामी के बाद जिसके कुल लगभग ढाई सौ सदस्य बचे हैं।

द्वीप के दक्षिण-पूर्वी तट पर स्थित है भारत के सबसे दक्षिणी छोर का इंदिरा पाइंट और निकट ही है गलाथिया खाड़ी, जो बंगाल की खाड़ी में प्रवेश कर मुलायम चांदी जैसी रेत का विहंगम दृश्य रचती है। यहीं समुद्र के सबसे विशाल लेदरबैक कछुओं के करीब पांच सौ प्रजनन स्थल हैं। लेदरबैक कच्छप इन आवासों में ऋतु में आते हैं और प्रजनन के उपरांत कुछ ऑस्ट्रेलिया, तो कुछ अफ्रीकी तटों की ओर निकल जाते हैं। यहां प्रवाल भी हैं और मैंग्रोव भी।यह प्रवासी पक्षियों का प्रिय स्थल है। जनजातीय और नृतत्व शास्त्रीय अध्ययन के लिये यह महत्त्वपूर्ण और कीमती पाठशाला है। जैव-विविधता की तो बात ही क्या!

ग्रेट निकोबार पर मेगा इंफ्रास्ट्रक्चर का खतरा

मगर यह विलक्षण लोक अब खतरे में है। ग्रेट निकोबार द्वीप संकटापन्न है। विवेकहीनता और अदूरदर्शिता की कोख से उपजी योजनाएं उसे निगल सकती हैं। वजह यह कि पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने नवंबर, सन् 2022 में एक विराट इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजना को पर्यावरणीय मंजूरी प्रदान की है। इसके लिए उसने द्वीप के समग्र विकास की लुभावनी शब्दावली इस्तेमाल की है। इस अधोसंरचना प्रोजेक्ट पर 72000 करोड़ रूपयों की लागत आयेगी।

इससे करीब तीन दशकों में ग्रेट निकोबार का हुलिया बदल जाएगा। गौरतलब है कि यह भूकंप के लिहाज से उच्च संवेदी और अति जोखिम का क्षेत्र भी है। सरकार की महत्वाकांक्षी परियोजना की बात करें तो समग्र विकास के कथित संजाल में 40,000 करोड़ रूपयों की लागत से ट्रांसशिपमेंट पत्तन (पोर्ट) बनेगा, जिसमें एक अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, एक विद्युत संयंत्र और एक ग्रीन फील्ड टाउनशिप शामिल होगी।

यह टाउनशिप सघन वन क्षेत्र में 130 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में जंगल को उजाड़कर बसाई जायेगी। मोटे तौर पर बस्ती बसाने के लिए दस लाख पेड़ काटे जाएंगे। यही नहीं इस अत्यंत विरल आबादी के क्षेत्र में, जहां की मौजूदा आबादी करीब आठ हजार है, तीन दहाइयों में जनसंख्या बढ़कर साढ़े तीन लाख हो जायेगी। यह जनसांख्यकीय परिवर्तन मुख्यत: विजातीय बहिरागतों के आगमन से होगा। सिर्फ कल्पना की जा सकती है कि आबादी में 4000 फीसद की वृद्धि, लोहे और कंक्रीट की इमारतें और बड़े पैमाने पर निर्वनीकरण शांत-सुरम्य निरापद द्वीप पर क्या गुल खिलायेंगे?

ग्रेट निकोबार पर शोध और विशेषज्ञों के लेख

प्रोफेसर पंकज सेखसरिया बीते करीब तीन दशकों से अंडमान-निकोबार पर काम कर रहे हैं। द्वीप पर उनका शोधपूर्ण लेखन अबाध गति से जारी है। इसी श्रृंखला में उनकी ताजा और छठवीं किताब आई है : ग्रेट निकोबार : कहानी विश्वासघात की। यह किताब एक तरह से श्रम और समय साध्य के शोध ग्रंथ है, जो पर्यावरण, पारिस्थितिकी और जनजातीय जीवन के प्रति ईमानदार और गहरी चिंता की कोख से उपजा है।

करीब डेढ़ सौ पेज की इस किताब में कतिपय दुर्लभ चित्रों के अलावा पंकज सेखसरिया, द वायर की आथिरा परिचेरी, जमशेद जी टाटा स्कूल ऑफ डिजास्टर स्टडीज में प्रो. जानकी अंधारिया और सहायक प्रोफेसर वी. रमेश, टाटा इंस्टीटयूट ऑफ सोशल साइंसेज के रविंद्र धीमान, न्यूरोसाइंस एवं वन्यजीव विज्ञान अनुसंधान में प्रशिक्षित बी.चौधरी, सेंटर फार वाइल्ड-लाइफ स्टडीज में डॉक्टोरल फैलो इशिका रामकृष्णा, उत्तरी अंडमान में जनमे आपदा प्रबंधन शास्त्री उदय मोंडल, समुद्री पारिस्थितिकीविद माही मनकेश्वर, एनवायरमेंटल एक्शन ग्रुप कल्पवृक्ष की सृष्टि बाज पाई, हर्पेटोलाजिस्ट और संरक्षण जीव विज्ञानी तथा मुन्नार में उभयचर पुनर्वास योजना पर कार्यरत एस. हरिकृष्णन, नेच कंजर्वेशन, फाउंडेशन, मैसूर से डाक्टरेट मनीष चंडी, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, दिल्ली में प्राध्यापक अजय सैनी और सामाजिक पर्यावरण की कार्यकत्री अधिवक्ता नार्मा अल्बारेज के लेख शामिल हैं।

यह भी पढ़ें… लोकतंत्र में ताजगी : क्यों ज़रूरी है युवा नेतृत्व

ग्रेट निकोबार: मेगा प्रोजेक्ट से आसन्न विनाश

आवरण पर आदिवासी अकादमी, तेजगढ़ के संस्थापक जी.एन.देवी को उद्धृत किया गया है। इन विद्वान लेखकों की स्पष्ट मान्यता है कि मेगा विकास के सपने एक अत्यंत संवेदनशील द्वीप के लिए विनाश की चेतावनी दे रहे हैं। द्वीप के विकास के लिए प्रस्तावित भीमकाय परियोजना अंतत: द्वीप के नाजुक वर्षा वन, पारिस्थितिकी तंत्र और आदिवासी आबादी को विनाश के कगार पर ले जायेगी। संघप्रिया मौर्य द्वारा कुशलता से अनूदित इन लेखों से गुजरे पर यह धारणा निर्मित होती है कि मेगा प्रोजेक्ट की गाथा सचमुच विश्वासघात की कहानी है।

लेख विनाश की गंभीरता और व्यापकता को उदघाटित करते हैं। चेतावनी स्वरूप यह पुस्तक ऐसी मानव निर्मित आपदा की ओर इंगित करती है, जो आगामी समय में दिसंबर, 2004 की त्सुनामी से भी ज्यादा शब्दों में यह किताब हमें आगाह करती है कि यदि हमने समय रहते कदम नहीं उठाया तो हम यह धरोहर सदा के लिए गँवा सकते हैं। इसमें शक नहीं कि किताब आसन्न विनाश के संदर्भों को परत-दर-परत उघाड़ती है।

ग्रेट निकोबार में विकास बनाम विनाश की चुनौती

राजीव गांधी ने अपने प्रधानमंत्रित्वकाल में विकास के बहाने विनाश के मद्देनजर ट्रांसशिपमेंट पत्तन योजना को खारिज कर दिया था, लेकिन अंतत: अब योजना अमलीजामे की ओर अग्रसर है। एनजीटी समझने में विफल रहा कि दाँव पर क्या लगा है और हम क्या गँवा सकते हैं। उसने एक कमेटी बनाई, जिसमें उन्हीं एजेंसियों के नुमाइंदे थे। परियोजना को लाने और लागू करने में हिस्सेदार थे।

जब पत्तन के प्रस्तावों पर चर्चा हो रही थी, तभी यह बात सामने आ गयी थी कि अडानी पोर्टस एंड स्पेशल इकोनामिक जोन लि., जेएसडब्लू इंफ्रा लि., रेल विकास निगम लि., कन्टेनर कार्पोरेशन आफ इंडिया लि. और डच ड्रेजिंग प्रमुख राय अल बेस्कालिस वेस्ट मिस्टर सहित दस बड़ी कंपनियों ने प्रोजेक्ट में शामिल होने की इच्छा (ईओएलएस) व्यक्त की है। संकट गहन है, क्योंकि हम ऐसे दौर से गुजर रहे हैं, जब सख्त वन कानूनों को विकास में बाधक माना जाने लगा है और सरकार में बड़े उद्योगों की रक्षा और बढ़ावे की प्रवृत्ति अत्यंत मजबूत है।

ग्रेट निकोबार दिसंबर, 2004 में भूकंप और सुनामी के अकल्पनीय प्रकोप का सामना कर चुका है। छोटे-मोटे भूकंप उसकी नियति है। बंदरगाह के निर्माण को सुकर बनाने के वास्ते राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड ने अभयारण्य गैर अधिसूचित कर दिया है। खतरे की सघनता को इससे आंकें कि बीती दहाई में द्वीपों ने 444 भूकंपों का सामना किया है। आईसीटीटी, हवाई अड्डा, टाउनशिप, बिजली संयंत्र के लिए 16610 हेक्टर और बंदरगाह व हवाई अड्डे के पुनर्ग्रहण के लिए 421 हेक्टर भूमि की जरूरत होगी।

ग्रेट निकोबार संकट पर विचारोत्तेजक चेतावनी

सन् 2004 के भूकंप में ग्रेट निकोबार की तटरेखा करीब 4.5 मीटर धँस गयी थी और इंदिरा पाइंट का लाइटहाउस आज भी पानी में है। बीते दशक में यहां भूकंपों की आवृत्ति बढ़ी है, लेकिन इसे इग्नोर किया जा रहा है। पहले यहां साल में 10-11 माह बारिश होती थी, अब वह घटकर पांच से आठ माह रह गयी है। बिलाशक हम जीवन की प्राकृतिक प्रयोगशालाओं को क्षति पहुंचाते जा रहे हैं।

डॉ. सुधीर सक्सेना
डॉ. सुधीर सक्सेना

ग्रेट निकोबार के लिए चिंतित लेखकों ने बहुत बोधगम्य और प्रामाणिक तरीके से बातें प्रस्तुत की हैं। ईशिका ने कछुओं और मैकाक के खतरों की बात की है, तो उदय मोंडल ने पक्षियों ओर मेगापोड नीड़ों पर खतरे से आगाह किया है। सृष्टि पूछती है कि क्या लेदर बैक कछुओं को अदालत में जाना चाहिये। मार्च, 1858 में इस क्षेत्र में आस्ट्रिया की शाही नौसेना के नोवारा अभियान का हवाला देते हुए हरिकृष्णन ने सरीसृपों और उभयचरों पर खतरे को दर्शाया है। मनीष चंडी की पतई तकरू की यादें मार्मिक वृत्तांत है। इस तरह अजय सैनी का आलेख यह किसकी जमीन है विचलित करता है। विकास की अंधी दौड के आत्मघाती दौर में इस विचारोत्तेजक आलेख संकलन को न सिर्फ पढ़ा और गुना जाना चाहिये, बल्कि उन युक्तियों को भी अपनाना चाहिये, जिनके जरिये हम भविष्य में विभीषिका से बच सकते हैं।

अब आपके लिए डेली हिंदी मिलाप द्वारा हर दिन ताज़ा समाचार और सूचनाओं की जानकारी के लिए हमारे सोशल मीडिया हैंडल की सेवाएं प्रस्तुत हैं। हमें फॉलो करने के लिए लिए Facebook , Instagram और Twitter पर क्लिक करें।

Related Articles

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

Back to top button