अचरजकारी छलांग !

भारतीय अर्थव्यवस्था ने एक बार फिर दुनिया को चौंका दिया है। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) के आँकड़ों के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2025-26 की दूसरी तिमाही (जुलाई-सितंबर 2025) में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 8.2 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। यह छह तिमाहियों का उच्चतम स्तर है, जो पिछले वर्ष की समान तिमाही के 5.6 प्रतिशत से कहीं अधिक है।

अर्थशास्त्रियों के अनुमान 7 से 7.5 प्रतिशत के बीच थे, इसलिए यह छलाँग न केवल अचरजकारी है, बल्कि वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच एक सकारात्मक संकेत भी है। दरअसल, जीडीपी वृद्धि का यह आँकड़ा मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस सेक्टर के मजबूत प्रदर्शन पर टिका है। मैन्युफैक्चरिंग में 9.1 प्रतिशत का उछाल आया, जो छह तिमाहियों का सर्वोच्च स्तर है। निर्माण क्षेत्र में 7.2 प्रतिशत और सेवाओं में दोगुनी से अधिक वृद्धि ने इंजन का काम किया। कृषि क्षेत्र 3.5 प्रतिशत बढ़ा, जो मानसून की अच्छी बरसात का परिणाम है।

तेज़ वृद्धि के बीच रोजगार, निवेश और ब्याज दरों पर उम्मीदें

निजी उपभोक्ता व्यय, जो जीडीपी का 57 प्रतिशत हिस्सा है, 7.9 प्रतिशत चढ़ा। आँकड़े बताते हैं कि घरेलू माँग और सरकारी पूँजीगत व्यय ने अमेरिकी टैरिफ जैसी वैश्विक चुनौतियों का मुकाबला किया। अच्छे प्रदर्शन से उत्साहित प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे प्रो-ग्रोथ नीतियों और सुधारों का परिणाम बताया है और जनता की मेहनत को श्रेय दिया है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को यह भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती का आईना लगता है। कई अर्थशास्त्री इसे नए भारत की रसोई में पक रही बड़ी चीज बता रहे हैं और ग्रामीण पुनरुद्धार पर जोर दे रहे हैं।

उम्मीद की जानी चाहिए कि इस बढ़ोतरी का असर कई रूपों में देखने को मिलेगा। बेशक, इससे अर्थव्यवस्था के दूरगामी और महत्वाकांक्षी लक्ष्य को गति मिलेगी। रोजगार सृजन की संभावना बढ़ी है, खासकर मैन्युफैक्चरिंग और निर्माण में। भारतीय रिजर्व बैंक अब ब्याज दरों में कटौती पर विचार कर सकता है। इससे निवेश को प्रोत्साहन मिलेगा। यह सुखद है कि भारत सबसे तेज बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था बना हुआ है। लेकिन इस तथ्य को नकारा नहीं जाना चाहिए कि हमारा व्यापार घाटा भी रिकॉर्ड स्तर पर पहुँचा हुआ है!

निर्यात स्थिर हैं; और सार्वजनिक ऋण जीडीपी के 82 प्रतिशत पर! महँगाई नियंत्रित (लगभग शून्य) होने से वास्तविक आय प्रभावित हो रही है। जॉबलेस ग्रोथ की स्थिति को तो श्रेयस्कर नहीं कहा जा सकता न! प्रतिपक्ष के इस सवाल को भी अनसुना नहीं किया जा सकता कि, आईएमएफ ने भारत और पाकिस्तान को समान ग्रेड – सी – क्यों दिया? आँकड़ों की विश्वसनीयता पर संदेह करते हुए यह भी पूछा जा रहा है कि, यदि हालात इतने ही अच्छे हैं, तो नौकरियाँ कहाँ हैं?

उच्च लक्ष्यों के लिए सतत विकास और निजी निवेश की ज़रूरत

तो, क्या यह अचरजकारी वृद्धि स्वाभाविक नहीं? वैश्विक टैरिफ के बावजूद पूर्वानुमान से 1 प्रतिशत अधिक वृद्धि पहली नज़र में अविश्वसनीय लग सकती है। लेकिन सुधारों – जीएसटी, उत्पादकता बढ़ाने वाली नीतियाँ और बुनियादी ढाँचा निवेश – के कारण यह स्वाभाविक भी लगती है। कहना न होगा कि यह झटके झेल जाने की भारत की क्षमता का ही प्रतीक है।

यह भी पढ़ें… तमोगुणी हास्य बनाम सतोगुणी संवेदना

अंततः इतना और कि आँकड़ों की चकाचौंध प्रायः स्थायी नहीं होती, इसलिए अर्थव्यवस्था के उच्च लक्ष्य को निर्धारित समय सीमा के भीतर हासिल करने के लिए सतत विकास ज़रूरी है। और सतत विकास के लिए ज़रूरी होगा- निजी निवेश, निर्यात वृद्धि और रोजगार सृजन पर फोकस। यदि ये चुनौतियाँ हल हुईं, तो भारत 2030 तक, 73 खरब डॉलर की जीडीपी के साथ, दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन सकता है। यह आँकड़ा जश्न का नहीं, चिंतन का विषय है; क्योंकि वृद्धि तभी सार्थक है जब वह हर भारतीय की जेब तक पहुँचे।

अब आपके लिए डेली हिंदी मिलाप द्वारा हर दिन ताज़ा समाचार और सूचनाओं की जानकारी के लिए हमारे सोशल मीडिया हैंडल की सेवाएं प्रस्तुत हैं। हमें फॉलो करने के लिए लिए Facebook , Instagram और Twitter पर क्लिक करें।

Related Articles

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

Back to top button