और अब प्रवासी धन पर ट्रंप की शनि दृष्टि

अफ़सोस कि अब अमेरिका हफ्ता-वसूली पर उतर आया है! उसके वन बिग ब्यूटीफुल बिल एक्ट नामक कानून ने भारतीय प्रवासियों और दुनिया भर में चिंता पैदा कर दी है। राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप द्वारा समर्थित इस कानून में गैर-अमेरिकी नागरिकों द्वारा विदेश भेजे जाने वाले पैसे पर 5 प्रतिशत टैक्स लगाने का प्रस्ताव है। भारत को इस नीति से भारी आर्थिक नुकसान हो सकता है।

ग़ौरतलब है कि 2023-24 में 118.7 अरब डॉलर के प्रवासी धन (रेमिटेंस) के साथ दुनिया में पहले स्थान पर रहे भारत में, इसमें से 27.7 प्रतिशत (32 अरब डॉलर) अमेरिका से आता है। मई 2025 में इस बिल पर वोटिंग की संभावना के बीच, इसके असर को समझना और नुकसान कम करने की रणनीति बनाना जरूरी है। सयाने बता रहे हैं कि इस बिल के पेज 327 पर उल्लिखित 5 प्रतिशत रेमिटेंस टैक्स हर विदेशी लेन-देन पर लागू होगा, चाहे वह छोटा हो या बड़ा।

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रेमिटेंस टैक्स से भारत और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर असर

रेमिटेंस के वर्तमान स्तर के हिसाब से भारत के लिए इसका मतलब है- सालाना 1.6 अरब डॉलर का नुकसान! ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (जीटीआरआई) का अनुमान है कि रेमिटेंस में 10-15 प्रतिशत की कमी से 12-18 अरब डॉलर का नुकसान हो सकता है। इससे भारत का विदेशी मुद्रा बाजार तंग हो सकता है और रुपये की कीमत 1-1.5 रुपये प्रति डॉलर तक कमजोर हो सकती है। ट्रंप की इस शनि दृष्टि के प्रकोप को कम करने के लिए, भारतीय रिजर्व बैंक को रुपये को स्थिर करने के लिए बार-बार हस्तक्षेप करना पड़ सकता है, जिससे इसके भंडार पर दबाव पड़ेगा।

केरल, उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में (जहाँ रेमिटेंस से शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी जरूरतें पूरी होती हैं) परिवारों पर भारी असर पड़ेगा, सो अलग। भारत के अलावा, मैक्सिको, फिलीपींस और मिस्र जैसे रेमिटेंस पर निर्भर देश भी प्रभावित होंगे। यह टैक्स इन देशों में परिवारों की आय को कम कर सकता है, जिससे असमानता बढ़ेगी और कमजोर अर्थव्यवस्थाओं में माँग घटेगी। यह टैक्स प्रवासियों को अनौपचारिक और गैर-कानूनी तरीकों से पैसे भेजने के लिए प्रेरित कर सकता है। इससे वैश्विक वित्तीय पारदर्शिता को नुकसान होगा।

रेमिटेंस टैक्स पर भारत की रणनीतिक चुनौतियाँ

कहना न होगा कि इस बिल का व्यापक संदर्भ संरक्षणवादी नीति की ओर इशारा करता है। रेमिटेंस टैक्स के साथ-साथ, इस बिल में अमेरिका-मेक्सिको सीमा दीवार के लिए 46.5 अरब डॉलर और अप्रवासन आवेदनों पर भारी शुल्क भी शामिल है, जो प्रवास पर सख्ती का संकेत है। यह ट्रंप के अमेरिका फर्स्ट नारे से मेल खाता है। बाकी दुनिया जाए भाड़ में! यह वैश्वीकरण से पीछे हटने का संकेत नहीं तो और क्या है?
सवाल उठना स्वाभाविक है कि, नुकसान कम करने के लिए भारत करे तो क्या करे?

तो सबसे पहले तो, सरकार को अमेरिका के साथ कूटनीतिक बातचीत कर भारतीय प्रवासियों के लिए छूट या कम टैक्स दरें हासिल करनी चाहिए। द्विपक्षीय व्यापार समझौते में अगर भारत अमेरिकी कृषि आयात पर टैरिफ कम करता है, तो उसके बदले में हमें भी तो कुछ मिलना चाहिए। दूसरे, भारतीय रिजर्व बैंक रेमिटेंस पर टैक्स क्रेडिट या सब्सिडी जैसे प्रोत्साहन दे सकता है। तीसरे, भारत को कनाडा और सिंगापुर जैसे अन्य देशों से रेमिटेंस बढ़ाने के लिए प्रवासियों को प्रोत्साहित करना चाहिए।

चौथे, अगर अमेरिका दादागिरी के नंगे नाच पर उतरता है, तो सिर झुकाकर देखने के बजाय उसके प्रतिरोध के लिए भी भारत को तैयार रहना चाहिए। अंतत यह कहना ज़रूरी है कि विश्व व्यवस्था डी-ग्लोबलाइजेशन की ओर बढ़ रही प्रतीत होती है। भारत को बहुपक्षीय व्यापार और प्रवास ढाँचों को मजबूत कर और घरेलू ताकत बढ़ाकर इसका जवाब देना चाहिए। सक्रिय कदम उठाकर ही भारत अपने आर्थिक हितों की रक्षा कर सकता है और रेमिटेंस में वैश्विक नेतृत्व बनाए रख सकता है।

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