किताबों पर प्रतिबंध!
जम्मू-कश्मीर सरकार ने हाल ही में 25 किताबों पर प्रतिबंध लगाने का फैसला किया है। प्रतिबंधित किताबों में अरुंधति रॉय की आज़ादी, ए.जी. नूरानी की द कश्मीर डिस्प्यूट 1947-2012 और सुमंत्र बोस की कश्मीर एट द क्राँसरोड्स जैसी रचनाएँ शामिल हैं। प्रशासन का दावा है कि ये किताबें झूठे नैरेटिव और अलगाववाद को बढ़ावा देती हैं तथा युवाओं को कट्टरपंथ और हिंसा की ओर ले जाती हैं।
यह निर्णय 5 अगस्त, 2025 को लिया गया, जो अनुच्छेद 370 हटाए जाने की छठी वर्षगाँठ के साथ मेल खाने के कारण प्रतीकात्मक महत्व रखता है। अचरज नहीं कि इस घटना ने साहित्यिक और बौद्धिक जगत में तीखी बहस छेड़ दी है। जबकि राज्य के गृह विभाग का कहना है कि इन किताबों में ऐतिहासिक तथ्यों को तोड़-मरोड़कर आतंकवाद का महिमामंडन और सुरक्षा बलों को बदनाम करने का प्रयास किया गया है। अर्थात इन पर प्रतिबंध केंद्रशासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा और शांति स्थापित करने के लिए उठाया गया कदम है!
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प्रतिबंध पर बहस: सुरक्षा बनाम स्वतंत्रता
कहना न होगा कि इस कदम का तत्काल प्रभाव किताबों की दुकानों और साहित्यिक आयोजनों पर छापेमारी के रूप में देखा गया। इसे विडंबना ही कहा जा सकता है कि किताबें ज़ब्त करने की यह कार्रवाई श्रीनगर में चिनार बुक फेस्टिवल के दौरान की गई! इससे न केवल लेखकों और प्रकाशकों, बल्कि पाठकों और साहित्य प्रेमियों में भी बेचैनी फैलना स्वाभाविक है। यह कदम कश्मीर के बौद्धिक माहौल को प्रभावित कर सकता है, जहाँ आतंकवाद और अलगाववाद से ख़तरे की दुहाई देते हुए पहले से ही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर शायद कई तरह के अंकुश लागू हैं।
लंबे समय में, यह प्रतिबंध साहित्यिक रचनाओं और शोध पर सेंसरशिप का डर पैदा कर सकता है, जो कश्मीर के जटिल इतिहास और वर्तमान को समझने की कोशिशों को बाधित करेगा। सयानों की मानें तो, इस फैसले पर मिली-जुली प्रतिक्रियाएँ आई हैं। मुख्यमंत्री महोदय ने स्पष्ट किया कि यह प्रतिबंध महामहिम उपराज्यपाल के गृह विभाग ने लगाया है और वे स्वयं इस तरह के कदम के पक्ष में नहीं हैं।
पीडीपी नेता महबूबा मुफ्ती और हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के मीरवाइज़ उमर फ़ारूक ने इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला बताया। ध्यान देने वाली बात यह है कि लेखक सुमंत्र बोस और डेविड देवदास ने अपने लेखन को शांति और संवाद की वकालत करने वाला करार देते हुए प्रतिबंध को अफसोसजनक कहा। दूसरी ओर, कुछ लोग इसे राष्ट्रीय सुरक्षा और क्षेत्रीय शांति के लिए जरूरी मानते हैं, यह तर्क देते हुए कि ऐसी सामग्री युवाओं को भटका सकती है।
किताबों पर प्रतिबंध: समाधान या समस्या?
बेशक, यह कदम आतंकवाद और अलगाववाद को रोकने के लिए उठाया गया है। मगर सवाल यह है कि क्या किताबों पर प्रतिबंध लगाना इन समस्याओं का सही समाधान है? कश्मीर का मसला ऐतिहासिक, राजनैतिक और सामाजिक जटिलताओं से भरा है। इन किताबों में भले ही सरकार के नैरेटिव से अलग दृष्टिकोण हों, लेकिन इन्हें पूरी तरह दबाना लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है। साहित्य विचारों का आदान-प्रदान करता है और इसे दबाने से असंतोष बढ़ सकता है।
इसके बजाय, व्यवस्था को इन किताबों का जवाब तथ्यपरक आलोचनात्मक लेखन या वैकल्पिक नैरेटिव के जरिए देना चाहिए था। यह प्रतिबंध कश्मीरियों की पहले से ही क्षत-विक्षत भावनाओं को और भी आहत कर सकता है न! सारांश यह कि, किताबों पर प्रतिबंध लगाना जम्मू-कश्मीर में जारी समस्याओं का सतही समाधान है। यह न केवल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कमज़ोर करता है, बल्कि कश्मीर के लोगों में अविश्वास को भी गहरा कर सकता है!
वहाँ जरूरत है संवाद, विश्वास और पारदर्शिता की; न कि किताबों पर प्रतिबंध की। व्यवस्था को चाहिए कि वह साहित्य और विचारों को दबाने के बजाय, कश्मीर के लोगों के साथ खुले मन से बातचीत करे। लोकतंत्र की जननी कहे जाने वाले देश में किताबों पर प्रतिबंध भला कैसे स्वीकार्य कहा जा सकता है?
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