रघुनाथ के प्रति पूर्णभाव से रहें समर्पित : सुश्री लक्ष्मीजी

हैदराबाद, संसार में बिना ईश्वर के कुछ संभव नहीं है। यदि इस संसार या जीवन में कुछ होता है, वह श्रीराम की कृपा से होता है। इसलिए कहा भी गया है कि होइहें वही जो राम रचि राखा। जब सब राघव की इच्छा से होता है, तो किसी प्रकार की चिंता करने का कोई लाभ नहीं है। केवल यही भाव रखना चाहिए कि मेरे साथ हर पल मेरे राम हैं।

उक्त उद्गार अत्तापुर स्थित श्री साई बाबा मंदिर प्रांगण में राजस्थानी जागृति समिति के तत्वावधान में आयोजित श्रीराम कथा के दूसरे दिन की कथा का श्रवण कराते हुए कथा वाचक बाल विदुषी सुश्री लक्ष्मीजी ने रखे। उन्होंने कहा कि भगवान को हमारे कल्याण की चिंता रहती है। इसलिए रघुनाथ के प्रति पूर्णभाव से समर्पित हो जाना चाहिए। भगवान राम सबका उद्धार करते हैं और अमंगल का हरण करते हैं। रामचरित मानस जीवन को जीना सिखाती है। इस कथा के सार को जीवन में आत्मसात करना चाहिए।

सुश्री लक्ष्मीजी ने कथा प्रसंग को विस्तार देते हुए कहा कि संत की, अनंत की, सग्रंथ की तथा भगवान के मंत्र की कभी परीक्षा नहीं लेनी चाहिए। जितनों ने भगवान की परीक्षा ली, उनका कभी हित नहीं हुआ। माता सती ने भी नारायण की परीक्षा लेने का प्रयास किया था, लेकिन साक्षात मायापति के आगे किसी प्रकार की माया का प्रभाव नहीं चलता है। जब-जब जीवन में कोई उपलब्धि और ऐश्वर्य मिलता है, तब-तब अभिमान भी हावी हो जाता है।

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प्रभु भक्ति में सहजता और सती कथा की सीख

दक्ष प्रजापति प्रसंग का उल्लेख करते हुए लक्ष्मीजी ने कहा कि समस्त संसार में ऐसा कोई नहीं है, जिसको प्रभुता पाने के बाद अभिमान न आए, लेकिन जीवन में अभिमान नहीं आना चाहिए।जब-जब अभियान आता है, भगवान दूर हो जाते हैं। प्रेम की गली बहुत संकरी होती है। इसमें या तो अभियान आएगा या राम आएंगे। हर चीज की श्रेय स्वयं न लेते हुए प्रभु को देना चाहिए। मैं और मेरा जैसे शब्द बड़े विचित्र होते हैं, जिसे समझने के लिए साधु-संतों का जीवन निकल जाता है। इसलिए जीवन में सहज भाव अपनाते हुए प्रभु की कृपा को प्राप्त करने का संकल्प लेना चाहिए।

सुश्री लक्ष्मीजी ने माता सती और महादेव का प्रसंग सुनाते हुए आगे कहा कि अगर कोई समझाने पर न समझे, तो उसे उसकी स्थिति पर छोड़ देना चाहिए। माता सती भगवान शंकर की सलाह न मानकर अपने पिता के घर गई थीं, जहां उन्हें पता चला कि उनके पति का अपमान हुआ है। क्रोध में माता सती ने अपने दाहिने पैर के अंगूठे से योगाग्नि उत्पन्न की और दक्ष के यज्ञ में ही अपनी आहूति दे दी। सरस कथा को विस्तार देते हुए उन्होंने सगुण और अगुण में भेद न करने व भगवान भोले शंकर की बारात का भी सुंदर वर्णन किया।

कथा में समिति के अध्यक्ष श्रीनिवास सोमाणी, कोषाध्यक्ष संजय राठी, सह-कोषाध्यक्ष मनीष सोमाणी, संगठन मंत्री रमेश मोदानी, कार्यकारिणी सदस्य जयप्रकाश लड्डा, बालाप्रसाद लड्डा व अन्य ने सहयोग प्रदान किया।

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