जन्म-कथा : काल भैरव सदाचारियों की करते हैं रक्षा

काल भैरव भगवान शिव के क्रुद्ध व रूद्र रूप हैं। भगवान शिव का यह रूप विनाश व प्रलय से जुड़ा है। काल भैरव का शरीर एकदम काला, क्रोधभरी आँखें, नुकीले दाँत व हाथों में अस्त्र-शस्त्र हैं। इनके मुख्यतः चार हाथ होते हैं- एक हाथ में भगवान ब्रह्मा का मस्तक, एक में त्रिशूल व अन्य दो में क्रमशः डंडा तथा डमरू होते हैं। काल भैरव को दंडपानि भी जाता है, क्योंकि इनके हाथ में लोहे का एक मोटा डंडा होता है, जिससे वे दुष्टों को दंड देते हैं। इनके गले में रुद्राक्ष की माला होती है। इनका वाहन काला कुत्ता है। भैरव भगवान को हमेशा दंड देने के लिए ही नहीं अपितु अच्छे लोगों की रक्षा करने के लिए भी जाना जाता है।

भैरव की कथा

काल भैरव का जन्म मुख्य रूप से तीन कारणों से हुआ था। इसलिए काल भैरव की कथा तीन कथाएँ हैं। काल भैरव शिवजी का एक रूप हैं लेकिन इनके कुल 64 रूप हैं। इनमें से आठ भैरव मुख्य हैं, जिन्हें अष्ट भैरव के रूप में पूजा जाता है।

कथा एक ब्रह्मा का मस्तक विच्छेद

भगवान ब्रह्मा व विष्णु में स्वयं की महानता सिद्ध करने के लिए विवाद होने लगा तो भगवान शिव ने उन दोनों की परीक्षा ली। इसमें भगवान विष्णु ने तो अपनी हार स्वीकार कर ली, किंतु ब्रह्मा ने झूठ बोलते हुए शिव का अपमान किया, जिसके फलस्वरूप काल भैरव का जन्म हुआ। काल भैरव ने अपने बायें हाथ की छोटी ऊँगली के नाखून से ब्रह्मा का पाँचवाँ मस्तक काटकर अलग कर दिया था, क्योंकि उन्होंने उसी मस्तक से झूठ बोला था। इसके बाद काल भैरव को ब्रह्म-हत्या का पाप लगा जिसका निवारण काशी नगरी में जाकर हुआ।

कथा दो

माता सती ने अपने पति शिव का अपमान होता देखकर पिता द्वारा आयोजित यज्ञ में अपने प्राणों की आहुति दे दी। इससे क्रोधित होकर भगवान शिव उनका मृत-शरीर लेकर समस्त ब्रह्माण में भ्रमण करने लगे। ऐसे में भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन-चक्र से माता सती के शव को 51 टुकड़ों में काट दिया, जो पफथ्वी पर 51 स्थानों पर गिरे। माता सती के शव के टुकड़े जहाँ-जहाँ गिरे, वहाँ-वहाँ शक्ति पीठ स्थापित किए गए। भगवान शिव ने शक्ति पीठों की रक्षा करने के लिए भैरव को भेजा। इसलिए हर शक्ति पीठ में भैरव बाबा का मंदिर है। नवरात्रि में अष्टमी या नवमी को कंजक ज़िमाते हैं। इनमें कंजकों के साथ एक भैरव बाबा को जिमाने की प्रथा है।

कथा तीन

एक बार देवताओं व दानवों के बीच भयंकर युद्ध हुआ तो भगवान शिव ने अपने पराम से 8 भैरवों की रचना की, जिन्हें अष्ट भैरव कहा गया। इन अष्ट भैरवों से सात-सात अन्य भैरवों की रचना हुई। इस तरह कुल 64 भैरव बने, जो आठ-आठ के समूह में थे। इन 64 भैरवों में से काल भैरव सबसे महान था, जिसके नेतृत्व में सब चलते थे। इस प्रकार उन्होंने राक्षसों का वध किया।

अष्ट भैरवों हैं- असितांग भैरव, रुद्र भैरव, चंद्र भैरव, क्रोध भैरव, उन्मत्त भैरव, कपाली भैरव, भीषण भैरव, संहार भैरव। इन आठों भैरवों के रूप व शस्त्र अलग-अलग हैं। इनकी पूजा करने की विधि भी अलग है। इन आठ भैरवों के साथ आठ भैरवियों की भी पूजा की जाती है, जिनके साथ इनका विवाह हुआ था। सबसे मुख्य काल भैरव की पत्नी को काल भैरवी कहा जाता है, जो उनके समान ही रूद्र रूप में हैं। काल भैरवी को माँ काली से जोड़कर भी देखा जाता है।

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आठ भैरवों में प्रमुख बटुक भैरव हैं। भैरव बाबा को भगवान शिव ने दो रूपों में विभाजित किया है। इसमें बटुक भैरव अपने भक्तों की रक्षा करने के उद्देश्य से बनाए गए, जो अच्छे लोगों को उनके कर्मों का फल देते हैं और काल भैरव का रूप अत्यंत क्रोधमय है, जो दुष्टों को उनके पापों का दंड देते हैं। शिव मंदिर में भैरव बाबा उत्तर दिशा में रहते हैं, जिनका मुख दक्षिण दिखा की ओर होता है। यह मंदिर की सुरक्षा की दृष्टि से होता है। इसलिए इन्हें क्षेत्रपाल या द्वारपाल की संज्ञा भी दी गई है।

ग्रामदेवता हैं भैरव

तमिलनाडु राज्य में इन्हें ग्राम देवता के नाम से पूजा जाता है। मान्यता है कि यह उनके गाँव, पशुओं व धन की रक्षा करते हैं। सामान्यतया भैरव बाबा को अच्छे लोगों की रक्षा करने के लिए जाना जाता है।

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