जलवायु न्याय की चिंता

दस नवंबर से ब्राजील के अमेज़न शहर बेलेम में शुरू हो रहा कॉप-30 सम्मेलन वैश्विक जलवायु परिवर्तन की लड़ाई का एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकता है। संयुक्त राष्ट्र की जलवायु संधि के 30वें दौर के इस सम्मेलन में दुनिया के नेता, वैज्ञानिक और कार्यकर्ता इकट्ठा होंगे। गर्म होती धरती को आग से बचाने के नए रास्ते तलाशेंगे। देखना यह भी है कि यह सम्मेलन सिर्फ कागजी घोषणाओं तक सीमित न रहे; कुछ वास्तविक बदलाव लाए!

कॉप-30 के सामने सबसे बड़ा मुद्दा है अनुकूलन (एडाप्टेशन) का। जलवायु परिवर्तन के असर से निपटने के लिए विकासशील देशों को हर साल 1.3 लाख करोड़ डॉलर की जरूरत है, लेकिन विकसित देश अभी तक पुराने वादों को पूरा नहीं कर पाए हैं। 2009 में दिए गए 100 अरब डॉलर के वित्तीय वादे का क्या हुआ? अभी भी आधे से कम ही पहुँचा है! सम्मेलन में अनुकूलन के लिए नई रणनीति बनानी होगी। कैसे किसानों को सूखा सहने वाली फसलें दी जाएँ? कैसे तटीय इलाकों को समुद्र के बढ़ते स्तर से बचाया जाए? भारत के लिए यह सीधा सवाल है – गंगा-यमुना के बाढ़ग्रस्त मैदानों में लाखों किसान कैसे जीवित रहें, जबकि मानसून अनियमित हो रहा है?

उत्सर्जन कटौती और न्यायपूर्ण ऊर्जा संक्रमण की चुनौती

दूसरा प्रमुख प्रश्न है उत्सर्जन कटौती का। पेरिस समझौते के तहत 2030 तक वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री तक सीमित रखना है। लेकिन वर्तमान योजनाएँ इसे 2.5 डिग्री तक पहुँचाती दिख रही हैं! विकसित देशों ने ऐतिहासिक उत्सर्जन की जिम्मेदारी ली है। लेकिन अमेरिका और यूरोपीय संघ जैसे देश अभी भी जीवाश्म ईंधन पर निर्भर हैं।

भारत, जो वैश्विक उत्सर्जन का मात्र 7 प्रतिशत हिस्सा रखता है, नेट-जीरो का लक्ष्य 2070 तक रख चुका है। लेकिन चुनौती यह है कि कोयले पर निर्भर ऊर्जा प्रणाली को सौर और पवन ऊर्जा से कैसे बदला जाए? हाल ही में भारत का इथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम सराहनीय है। लेकिन किसानों को सस्ती बायोफ्यूल उत्पादन की तकनीक कहाँ से मिलेगी? कॉप-30 में न्यायपूर्ण संक्रमण(जस्ट ट्रांजिशन) की बात होगी – नौकरियाँ खोएँ नहीं, बल्कि नई सृजित हों।

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कॉप-30 में भारत की निर्णायक भूमिका और जलवायु न्याय

हानि और क्षति (लॉस एंड डैमेज) फंड भी एक केंद्रीय मुद्दा बनेगा। 2022 की पाकिस्तान बाढ़ जैसी आपदाओं ने दिखाया कि विकासशील देश भुगतान न कर सकें तो भला अरबों का नुकसान कैसे भरेंगे! भारत ने पहले ही इस फंड में योगदान दिया है। अब विकसित देशों से माँग है कि वे इसे मजबूत बनाएँ। विचारणीय यह भी है कि व्यापार और जलवायु का तालमेल कैसे हो। अमेज़न जैसे जंगलों को बचाने के लिए वैश्विक व्यापार नीतियाँ बदलनी होंगी।

ताकि अवैध कटाई रुके। लेकिन राजनीतिक चुनौतियाँ भी कम नहीं। अमेरिका की ज़िद्दी अस्थिरता, यूरोप का आर्थिक संकट – ये सब सम्मेलन की दिशा बदल सकते हैं। ऐसे में भारत की भूमिका निर्णायक हो सकती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वन अर्थ, वन सन, वन ग्रिड जैसे विचार दिए हैं, जो वैश्विक साझेदारी को मजबूत करते हैं। लेकिन भारत को साफ कहना होगा कि जलवायु न्याय वित्तीय सहायता के बिना संभव नहीं! हमारा जीडीपी पहले ही 2-3 प्रतिशत प्रभावित हो रहा है – फसलें बर्बाद, बिजली संकट, स्वास्थ्य खर्च बढ़ना।

कॉप-30 में भारत को ग्लोबल साउथ का नेतृत्व करना चाहिए, ताकि छोटे द्वीप राष्ट्रों और अफ्रीकी देशों की आवाज बुलंद हो। अंत में, कॉप-30 सिर्फ सम्मेलन नहीं, बल्कि मानवता की नैतिक जिम्मेदारी है। अगर विकसित देश सच्ची इच्छाशक्ति दिखाएँ, तो हम 2030 के लक्ष्यों को पा सकते हैं। भारत जैसे देशों को अनुकूलन और वित्त के नाम पर धोखा नहीं मिलना चाहिए।

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