भगवान नाम, भजन का धन करें एकत्रित, यही करेगा कल्याण : कौशिकजी
हैदराबाद, जिस प्रकार व्यक्ति धन को बचाता है, उसी प्रकार संयम के साथ चरित्र को बचाना चाहिए, क्योंकि चरित्र में सुंगध है। इससे काम, क्रोध, लोभ, दोष समाप्त होता है। जीवन में भगवान का नाम, भजन, इकट्ठा करें, यही जीवन का कल्याण करेंगे। उक्त उद्गार कोलसावाड़ी स्थित राजस्थानी सैनिक क्षत्रिय माली संघ में संत श्री लिखमीदासीजी (माली) सेवा समिति हैदराबाद-तेलंगाना द्वारा आयोजित श्रीराम वनवास कथा के द्वितीय दिवस कथा का रसपान कराते हुए आचार्य कौशिकजी महाराज ने व्यक्त किये।
महाराज ने कहा कि राधाष्टमी पावन पवित्र दिन है। माता कीर्ति ने जब एक देव मंदिर में किसी सत्ता को वायु के रूप में प्रकट किया, तो उसने सुन्दर कन्या का रूप लिया। झूले में लंबे समय तक राधा रानी के नेत्र बंद रहे और जब माता यशोदा अपने लाला के साथ कन्या को देखने आई, तब राधारानी ने नेत्र खोलकर श्रीकृष्ण को देखा। जगत कल्याण करने वाली धारा धरती पर राधा बनी।रा शब्द का उच्चारण करते ही प्रभु दौड़ पडते हैं और धा शब्द का उच्चारण करते ही गोविन्द अपने गले से भक्तों को लगा लेते हैं। आज पूरा देश ब्रजमंडल नाच रहा है, क्योंकि श्रीजी का प्राकट उत्सव है।
राधाष्टमी का संदेश: प्रेम और बेटियों का सम्मान
महाराज ने कहा कि सभी अपने बेटों का जन्मदिन उत्साह से मनाते हैं, लेकिन बेटियों का जन्म पता ही नहीं लगता। कुछ समय से राधा अष्टमी का व्रत भी श्रीकृष्ण जन्माष्टमी से कम नहीं पड़ रहा है। यह पर्व यही संदेश देता है कि बेटियों को खूब लाड़ दुलार करो, जिनको कन्या नहीं है, वह राधा रानी को अपनी बेटी मान लें। दुनिया के लिए रिश्ते तोड़ देते हैं, पर प्रभु रिश्ता नहीं तोड़ते। राधा कृष्ण की लीला अद्भु त है, क्योंकि प्रेम शब्द ही धरती पर इनके प्रकट से आया है। महाराज ने कहा कि प्रभु ने कृपा कर शरीर दिया, जो भारी मुश्किल से मिलता है और लोगों ने शरीर को पशु की तरह बना दिया।
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भक्ति, संयम और राधाष्टमी व्रत का महत्व
महाराज ने कहा कि बचा जीवन परमात्मा की भक्ति में लगाएँ। मंदिर में जाने से दर्शन करने से कार्य नहीं होगा। दुर्योधन, शकुनि ने भगवान के दर्शन किए, पर कोई लाभ नहीं हुआ। जबकि अर्जुन ने प्रभु की शरणागति ली, तो भगवान जीवन रथ में बैठ गये। महाराज ने कहा कि श्रीरामजी अयोध्या से वन चले गये, तो अयोध्या में काम, क्रोध और लोभ आया और स्थिति बिगड़ गई। यह तीनों नरक देने वाले हैं। इनसे सावधान रहें।
महाराज ने कहा कि व्यसन से सावधान रहें, पलट कर रख देंगे। क्रोध करने से पुण्य नष्ट होता है। संसार के भोग में लिप्त रहने से तीन दोष आयेंगे और शांति, समर्पण और सत्य चला जाएगा। ईश्वर जैसा रखें, वैसे ही खुश रहें, जिन्दगी मुस्करायेगी। महाराज ने कहा कि हम अपने धर्म, भगवान के बिना न रहें। करोड़ों कार्य करें, पर नाम स्मरण करते रहें। पद्म पुराण में कहा गया कि राधाष्टमी का व्रत करने से एक लाख एकादशी का फल मिलता है ।
पर्व तिथि में व्यक्ति भूलकर अन्न न खाये। खाना जिन्दगी भर चलेगा, व्रत में अन्न छोड़ा जाता है, क्योंकि इसमें दुर्गुण है और इंद्रियाँ शिथिल होती हैं। इसलिए व्रत में अन्न छोड़ना चाहिए। अवसर पर संत श्री लिखमीदासजी (माली) सेवा समिति हैदराबाद-तेलंगाना के सदस्यों सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित थे।
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